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सुप्रीम कोर्ट ने धर्म में अंधविश्वास की परिभाषा तय करने का अधिकार स्वीकार किया

सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश से संबंधित मामले में सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट किया कि धर्म में अंधविश्वास की परिभाषा तय करने का अधिकार उसके पास है। केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर अपनी दलील पेश की, लेकिन न्यायालय ने कहा कि यह तय करना अदालत का कार्य है। 22 अप्रैल तक 50 से अधिक याचिकाओं पर सुनवाई जारी रहेगी। जानें इस महत्वपूर्ण मामले के बारे में और क्या कहा गया।
 

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी


सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश से संबंधित मामले की सुनवाई का दूसरा दिन था। इस सुनवाई में, कोर्ट ने यह विचार किया कि धर्म के भीतर अंधविश्वास की परिभाषा तय करने का अधिकार किसके पास है।


न्यायालय ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि यह निर्धारित करना कि किसी धर्म में कौन सी प्रथा अंधविश्वास है, उसके अधिकार क्षेत्र में आता है।


केंद्र सरकार की दलील

यह टिप्पणी केंद्र सरकार की उस दलील के जवाब में आई, जिसमें सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि धर्मनिरपेक्ष अदालत इस मुद्दे पर निर्णय नहीं ले सकती, क्योंकि न्यायाधीश केवल कानून के विशेषज्ञ होते हैं।


उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई प्रथा अंधविश्वास मानी जाती है, तो इसे सुधारने का कार्य विधायिका का है, न कि अदालत का।


अदालत का अधिकार

हालांकि, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने मेहता के तर्क को सरल बताते हुए कहा कि अदालत के पास यह तय करने का अधिकार है कि कोई चीज अंधविश्वास है या नहीं।


उन्होंने स्पष्ट किया कि इसके बाद क्या कार्रवाई होगी, यह विधायिका का कार्य है, लेकिन अदालत का निर्णय अंतिम नहीं हो सकता।


सुनवाई की समयसीमा

धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव का मामला पिछले 26 वर्षों से अदालतों में चल रहा है। 2018 में, 5 जजों की बेंच ने 4:1 के बहुमत से मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को हटा दिया था।


सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान बेंच 7 अप्रैल से 22 अप्रैल तक 50 से अधिक याचिकाओं पर सुनवाई करेगी।