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सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम तलाक प्रथाओं पर सुनवाई, महिलाओं ने उठाए गंभीर सवाल

सुप्रीम कोर्ट 27 अक्टूबर को मुस्लिम समाज में प्रचलित तलाक की प्रथाओं की वैधता पर सुनवाई करेगा। कई महिलाओं ने आरोप लगाया है कि उनके पतियों ने बिना उचित प्रक्रिया के व्हाट्सऐप और ईमेल के माध्यम से तलाक देने का प्रयास किया। इस मामले में धार्मिक स्वतंत्रता और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल उठ रहे हैं। अदालत ने कहा है कि यदि किसी धार्मिक प्रथा का मानवाधिकारों पर असर पड़ता है, तो वह हस्तक्षेप कर सकती है।
 

नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई


नई दिल्ली: मुस्लिम समुदाय में प्रचलित तलाक-ए-हसन, तलाक-ए-अहसन और एकतरफा तलाक की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट 27 अक्टूबर को सुनवाई करेगा। इन याचिकाओं में कई मुस्लिम महिलाओं ने आरोप लगाया है कि उनके पतियों ने बिना किसी बातचीत या उचित प्रक्रिया के व्हाट्सऐप संदेश और ईमेल के माध्यम से उन्हें तलाक देने का प्रयास किया। याचिकाकर्ताओं ने इस प्रकार के मामलों को 'वर्चुअल डिवोर्स' का नाम दिया है।


सुप्रीम कोर्ट की स्थिति

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि केंद्र सरकार या अन्य पक्षकार अपना जवाब नहीं देते हैं, तो भी पीड़ित महिलाओं की याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई आगे बढ़ेगी। अदालत ने पहले ही केंद्र सरकार और संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर दिया है।


व्हाट्सऐप और ईमेल के माध्यम से तलाक का आरोप

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने बताया कि कुछ मुस्लिम पुरुष अपनी पत्नियों को व्हाट्सऐप और ईमेल के जरिए तलाक देने का प्रयास कर रहे हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ऐसी स्थितियों में महिलाओं को अपनी बात रखने या वैवाहिक विवाद सुलझाने का उचित अवसर नहीं मिलता।


महिलाओं के जीवन पर प्रभाव

याचिकाकर्ताओं ने अदालत में यह भी कहा कि ऐसी प्रथाओं का महिलाओं के जीवन और भविष्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए, उन्होंने तलाक की इन व्यवस्थाओं की संवैधानिक वैधता की जांच करने की मांग की है।


सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि न्यायपालिका को सभी धर्मों की परंपराओं और मान्यताओं का सम्मान करना चाहिए और धार्मिक मामलों में सामान्यतः कम से कम हस्तक्षेप करना चाहिए। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी धार्मिक प्रथा का असर मानवाधिकारों या वैधानिक अधिकारों पर पड़ता है, तो अदालत उन अधिकारों की रक्षा के लिए हस्तक्षेप कर सकती है।


पीड़ित महिलाओं की कहानियाँ

सुप्रीम कोर्ट में पत्रकार बेनजीर हीना सहित कई तलाक पीड़ित महिलाओं की याचिकाएँ लंबित हैं। याचिकाओं में महिलाओं ने अपने वैवाहिक जीवन से जुड़ी परेशानियों और कथित अन्याय का उल्लेख किया है।


कुछ महिलाओं का आरोप है कि उनके पतियों ने बिना किसी बातचीत के केवल व्हाट्सऐप संदेश या ईमेल भेजकर तलाक की सूचना दी। वहीं, कुछ महिलाओं ने दावा किया है कि वे अशिक्षित हैं और उनके पतियों ने उनकी स्थिति का फायदा उठाकर सादे कागजों पर धोखे से हस्ताक्षर या अंगूठे के निशान ले लिए।