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सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मामले की महत्वपूर्ण सुनवाई शुरू होने वाली है

सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मामले पर 7 अप्रैल से महत्वपूर्ण सुनवाई शुरू होने जा रही है। यह सुनवाई महिलाओं के धार्मिक स्थलों पर प्रवेश के अधिकार और समानता के मुद्दों पर केंद्रित है। जानें इस मामले का इतिहास, पुनर्विचार याचिकाएं और अदालत के संभावित निर्णय का प्रभाव।
 

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की तैयारी


नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मामले पर एक महत्वपूर्ण सुनवाई होने जा रही है। शीर्ष अदालत की नौ सदस्यीय संविधान पीठ 7 अप्रैल से केरल के सबरीमाला मंदिर और अन्य धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश से संबंधित याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई शुरू करेगी।


संविधान पीठ की संरचना

सुप्रीम कोर्ट की 7 अप्रैल की वाद सूची के अनुसार, इस संविधान पीठ में प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत के साथ न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना, एमएम सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, आगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी वराले, आर महादेवन और जायमाल्या बागची शामिल हैं। यह पीठ इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर अंतिम निर्णय देने की दिशा में सुनवाई करेगी।


मामले का सारांश

क्या है पूरा मामला?


यह मामला धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश और समान अधिकारों से संबंधित है। विशेष रूप से, सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगाए गए प्रतिबंध को लेकर यह विवाद लंबे समय से चल रहा है।


सितंबर 2018 में, सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 4-1 के बहुमत से इस प्रतिबंध को समाप्त कर दिया था। अदालत ने इसे असंवैधानिक बताते हुए कहा था कि यह महिलाओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।


पुनर्विचार याचिकाओं का कारण

क्यों दाखिल की गईं पुनर्विचार याचिकाएं?


हालांकि, इस फैसले के बाद देशभर में व्यापक बहस और विरोध हुआ। इसके परिणामस्वरूप कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं। 14 नवंबर 2019 को, तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने 3-2 के बहुमत से इस मामले को बड़ी संविधान पीठ को भेज दिया था।


अगली सुनवाई की तिथि

कब होगी अगली सुनवाई?


अब नौ सदस्यीय संविधान पीठ न केवल सबरीमाला बल्कि अन्य धर्मों और धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश और समानता के अधिकार से जुड़े व्यापक मुद्दों पर विचार करेगी। यह सुनवाई धार्मिक स्वतंत्रता और लैंगिक समानता के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।


अदालत को यह निर्णय लेना होगा कि क्या धार्मिक परंपराओं के नाम पर महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है या यह संविधान के तहत दिए गए समानता के अधिकार का उल्लंघन है। इस सुनवाई का प्रभाव देशभर के कई धार्मिक स्थलों पर पड़ सकता है, जहां महिलाओं के प्रवेश के लिए विभिन्न नियम लागू हैं।