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सोनम वांगचुक का आंदोलन: छात्रों की आवाज़ का उभार

सोनम वांगचुक के नेतृत्व में जंतर मंतर पर छात्रों का आंदोलन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहा है। यह आंदोलन शिक्षा में गड़बड़ियों के खिलाफ एक व्यापक स्वरूप ले चुका है। छात्रों का आक्रोश और समर्थन डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी बढ़ रहा है। जानिए इस आंदोलन की पृष्ठभूमि और इसके प्रभाव के बारे में।
 

जंतर मंतर पर भूख हड़ताल का आगाज़

जंतर मंतर पर सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल और कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन एक साधारण मांग के साथ शुरू हुआ। अभिजीत दीपके, जो अमेरिका से लौटे थे, ने 6 जून को इस प्रदर्शन का आयोजन किया और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की। उन्होंने अमेरिका में एक सोशल मीडिया हैंडल 'कॉकरोच जनता पार्टी' बनाया था, जिसे बाद में प्रतिबंधित कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने 'कॉकरोच इज बैक' नाम से नया हैंडल बनाया। यह आंदोलन शिक्षा मंत्री के इस्तीफे को मुद्दा बनाकर शुरू हुआ।


दीपके ने महाराष्ट्र के अपने गांव से कई संदेश भेजे और जयपुर व नागपुर में भी प्रदर्शन किए। हर जगह उनका एक ही संदेश था कि धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना चाहिए। यह एक लोकलुभावन राजनीतिक नारा था, लेकिन इसे जमीनी स्तर पर ज्यादा समर्थन नहीं मिला। सोशल मीडिया पर फॉलोवर्स की संख्या तेजी से बढ़ी, लेकिन यह दो दिन बाद ही थम गई। 6 जून का प्रदर्शन सीमित सफलता के साथ समाप्त हुआ, जिसमें दीपके तीन घंटे के प्रदर्शन के बाद बेहोश हो गए।


सोनम वांगचुक ने इस आंदोलन को एक नया आकार दिया। वे शिक्षा के क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं और उनकी नैतिक ताकत है। जब उन्होंने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के साथ-साथ शिक्षा और परीक्षा की गड़बड़ियों को मुख्य मुद्दा बनाया, तब आंदोलन का दायरा बढ़ गया।


सरकार इस आंदोलन की गंभीरता को समझने में असफल रही। वे इसे जंतर मंतर पर जुटी भीड़ से माप रही थीं, जबकि यह आंदोलन सोनम वांगचुक और कॉकरोच जनता पार्टी की सीमाओं से परे फैल चुका था। देश के विभिन्न हिस्सों में लोग इस आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं, और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी इसका समर्थन बढ़ रहा है।


हर राज्य में परीक्षा में गड़बड़ियां हो रही हैं, जैसे समय पर परीक्षा न होना, पेपर लीक होना, और नतीजों में देरी होना। लाखों छात्रों की उम्र सीमा निकल रही है, और वे इस आंदोलन को अपने आक्रोश की अभिव्यक्ति मान रहे हैं।


कॉकरोच जनता पार्टी का गठन मई में हुआ, लेकिन छात्रों की समस्याएं कई वर्षों से चल रही हैं। केंद्र सरकार इस आंदोलन को नजरअंदाज कर रही है, जो एक बड़ी गलती है। पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों को उठाना और बिना बैक चैनल वार्ता के सीधे बातचीत करना भी गलत था।


सरकार का यह प्रयास कि छात्रों के आंदोलन को आपराधिक कृत्य बताकर दबाया जाए, भी गलत है। इससे सरकार की छवि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। छात्रों का गुस्सा बढ़ेगा, और यह आंदोलन और भी मजबूत होगा।


सरकार को चाहिए कि वह छात्रों के आक्रोश को समझे और संवेदनशीलता से इस मुद्दे को सुलझाने का प्रयास करे। यह केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह देश के छात्रों और युवाओं का मामला है।