☰
×

सोशल मीडिया प्रभाव और चुनावी रणनीतियों पर नई सोच की आवश्यकता

भारतीय जनता पार्टी और अन्य राजनीतिक दलों ने सोशल मीडिया पर लोकप्रिय नेताओं को प्राथमिकता देने का निर्णय लिया है। लेकिन राजस्थान के स्थानीय निकाय चुनाव में एक इन्फ्लूएंसर को मिले केवल 33 वोट यह दर्शाते हैं कि फॉलोअर्स की संख्या हमेशा चुनावी सफलता की गारंटी नहीं होती। इस स्थिति ने सभी पार्टियों को अपनी रणनीतियों पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता को उजागर किया है। क्या नेताओं को जमीनी काम पर अधिक ध्यान देना चाहिए? जानिए इस लेख में।
 

सोशल मीडिया का महत्व और चुनावी टिकट


भारतीय जनता पार्टी समेत अन्य राजनीतिक दलों ने यह निर्णय लिया है कि सोशल मीडिया पर लोकप्रिय नेताओं को पार्टी में महत्वपूर्ण स्थान दिया जाएगा और उन्हें चुनावी टिकट देने में प्राथमिकता दी जाएगी। कुछ वर्षों पहले भाजपा ने 50,000 फॉलोअर्स की एक सीमा निर्धारित की थी, जिसके अनुसार केवल वही लोग टिकट के लिए आवेदन कर सकते थे जिनके पास इतने फॉलोअर्स हों। हाल ही में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पार्टी के नेताओं को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे एक्स, फेसबुक और इंस्टाग्राम पर सक्रिय रहने की सलाह दी, क्योंकि इंस्टाग्राम पर युवा वर्ग की संख्या अधिक है।


राजस्थान के चुनावों में सोशल मीडिया की असली तस्वीर

हालांकि, राजस्थान के स्थानीय निकाय चुनावों में एक सीट पर एक सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसर ने चुनाव लड़ा, जिसके पास 21 लाख फॉलोअर्स थे, लेकिन उसे केवल 33 वोट मिले। यह स्थिति सभी पार्टियों के लिए एक चेतावनी है कि सोशल मीडिया पर फॉलोअर्स की संख्या हमेशा वास्तविक वोटों में तब्दील नहीं होती। यह संभव है कि ये फॉलोअर्स किसी अन्य राज्य या देश से हों या फिर राजनीतिक मामलों में रुचि न रखते हों। इसलिए, नेताओं और राजनीतिक दलों को जमीनी स्तर पर काम करने पर अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहिए।