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स्वीडन में भारतीय उद्यमी की कहानी: कैसे एक 'विदेशी-विरोधी' व्यवस्था ने किया बेदखल?

भारतीय उद्यमी अभिजीत नाग ने स्वीडन में अपनी कंपनी की स्थापना की, लेकिन स्वीडिश माइग्रेशन एजेंसी की बाधाओं के कारण उन्हें स्वदेश लौटने पर मजबूर होना पड़ा। उन्होंने अपनी कंपनी बेच दी और इसे एक 'विदेशी-विरोधी' व्यवस्था का परिणाम बताया। इस प्रक्रिया ने उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव डाला। स्वीडन की सख्त होती आप्रवासन नीतियों के बीच, यह कहानी उद्यमियों के लिए एक चेतावनी है।
 

भारतीय उद्यमी की स्वीडन में यात्रा


नई दिल्ली: भारतीय उद्यमी अभिजीत नाग बालासुब्रमण्यम, जिन्हें अभि के नाम से जाना जाता है, ने मई 2025 में स्वीडन के स्केलेफ्टिया में हाइड्रो स्पेस स्वीडन एबी नामक कंपनी की स्थापना की। यह कंपनी हाइड्रोपोनिक तकनीक का उपयोग करके माइक्रोग्रीन्स (छोटे पौधे) उगाने पर केंद्रित थी।


कंपनी का उद्देश्य उत्तरी स्वीडन में स्थानीय खाद्य सुरक्षा को बढ़ावा देना था। शुरुआत में, कंपनी को स्थानीय ग्राहकों और दुकानों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली, जिससे स्थानीय रोजगार के अवसर भी उत्पन्न हुए।


आप्रवासन एजेंसी की समस्याएं

हालांकि, कंपनी के संचालन के दौरान स्वीडिश माइग्रेशन एजेंसी (Migrationsverket) ने उनके रेसिडेंस और वर्क परमिट में कई बार बाधाएं उत्पन्न कीं। अभि ने लिंक्डइन पर एक पोस्ट में बताया कि एजेंसी ने पारदर्शिता नहीं दिखाई और दस्तावेजों पर स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं दिए, साथ ही बार-बार कारणों में बदलाव किया।


उन्होंने यह भी कहा कि अधिकारियों को व्यवसाय की समझ नहीं थी। कंपनी की सफलता के बावजूद, एजेंसी ने उनके बिजनेस परमिट को मंजूरी नहीं दी।


कंपनी बेचकर स्वदेश लौटने की मजबूरी

अभि ने बताया कि उन्हें इस महीने के अंत तक स्वीडन छोड़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है। उन्होंने अपनी कंपनी बेच दी और इस्तीफा दे दिया। उन्होंने इसे स्वेच्छा से नहीं, बल्कि राज्य की अक्षम और शत्रुतापूर्ण व्यवस्था द्वारा बेदखली के रूप में वर्णित किया।


उन्होंने कहा कि यह एक 'विदेशी-विरोधी' व्यवस्था है, जो अंतरराष्ट्रीय उद्यमियों के लिए दिखावटी 'स्टार्टअप-अनुकूल' छवि प्रस्तुत करती है।


मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव

इस पूरी प्रक्रिया ने अभि के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाला। अनिश्चितता के कारण उन्हें पैनिक अटैक का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि उनकी ऊर्जा और इच्छाशक्ति समाप्त हो गई है। वे कानूनी लड़ाई लड़ने के बजाय भारत लौटकर आराम करना और अपने मानसिक स्वास्थ्य को सुधारना चाहते हैं।


स्वीडन की नीतियों में बदलाव

यह घटना उस समय हुई है जब स्वीडन अपने आप्रवासन नियमों को सख्त कर रहा है। हाल ही में, नागरिकता के लिए आवश्यक प्रवास की अवधि 5 साल से बढ़ाकर 8 साल कर दी गई है। भाषा और संस्कृति के परीक्षण भी कड़े हो गए हैं। यूरोपीय देशों में आप्रवासियों के प्रति नफरत बढ़ रही है, जिससे प्रतिभाओं को आकर्षित करने की छवि पर सवाल उठ रहे हैं।