हिंदू नेताओं की राजनीतिक कमजोरी और मुस्लिम दबदबे का विश्लेषण
हिंदू नेताओं की राजनीतिक स्थिति
हिंदू नेता अपने ही समुदाय के विरोधियों के सामने जितने साहसी बनते हैं, उतने ही मुस्लिम या विदेशी ताकतवरों के सामने झुक जाते हैं। यह बात मौलाना मुहम्मद अली और विन्स्टन चर्चिल ने भी देखी थी। बराक ओबामा और डोनाल्ड ट्रंप ने भी इस प्रवृत्ति को पहचाना है। अधिकांश हिंदू नेता मजबूत प्रतिकूलताओं या सहयोगियों के साथ सहज नहीं होते; वे केवल अनुयायी चाहते हैं। यह प्रवृत्ति आम हिंदू बौद्धिकों में भी देखी जाती है, जो समान विचारधारा वाले लोगों के साथ ही सहज रहते हैं।
पिछले पंद्रह से बीस वर्षों के मीडिया रिकॉर्ड से यह स्पष्ट होता है कि हिंदू विमर्श, चाहे वह नेता हों या प्रोफेसर, तीन श्रेणियों में बंटा हुआ है: परनिन्दा, आत्मश्लाघा, और परउपदेश। जो इस दायरे से बाहर हैं, वे कहीं नहीं मिलते।
यह केवल 'महात्मा', 'विश्वगुरु', या 'अजैविक' जैसे व्यक्तियों की बात नहीं है। हिंदू नेताओं की स्थिति दलीय सीमाओं से परे समान है। वे बड़े-बड़े दावे करते हैं, लेकिन जब वास्तविकता का सामना करना पड़ता है, तो वे पीछे हट जाते हैं।
1880 के दशक से हिंदू-मुस्लिम और ब्रिटिश गवाहियों में यह प्रवृत्ति स्पष्ट है। इन गवाहियों में नेता, विचारक, और लेखक शामिल हैं। यह प्रतीत होता है कि हिंदू लोग जिन कार्यों में सक्षम हैं, वहां राजनीति में वे कमजोर हैं।
पाकिस्तान ने पिछले पच्चीस वर्षों में इस्लामी आतंकवाद को बढ़ावा दिया है और पश्चिमी देशों से धन प्राप्त किया है। इसके बावजूद, पाकिस्तान ने अपनी स्थिति को बनाए रखा है। जबकि हिंदू नेता शांति और अहिंसा की बातें करते हैं, वे वास्तविकता में कुछ नहीं करते।
एक प्रमुख ब्रिटिश नेता ने 1942 में कहा था कि 'हिंदुओं में शासन की क्षमता नहीं है, इसलिए अंततः मुसलमान ही शासन करेंगे।' यह बात आज भी सही साबित हो रही है।
हिंदू नेताओं की यह प्रवृत्ति सौ साल पहले भी देखी गई थी और आज भी वही है। वे केवल बातें बनाते हैं, जबकि मुस्लिम समुदाय अपने अधिकारों के लिए सक्रियता से काम कर रहा है।
हिंदू नेताओं ने अपने हाथों से करोड़ों लोगों को देश से बाहर कर दिया, जिससे पाकिस्तान का निर्माण हुआ। इस निर्णय के खिलाफ कोई भारतीय खड़ा नहीं हुआ।
हिंदू नेता हमेशा दूसरों को दोष देते हैं और अपनी सफाई गढ़ते हैं। यह प्रवृत्ति आज भी जारी है।
स्वामी विवेकानंद ने भी इस बात को पहचाना था कि हिंदुओं का स्वभाव स्त्रैण है। वे आपस में लड़ते हैं, लेकिन बाहरी दबदबे को स्वीकार करते हैं।
इस प्रकार, हिंदू नेता अपने ही हिंदू बंधुओं के सामने शेर बनते हैं, लेकिन मुस्लिम या विदेशी दबंगों के सामने झुक जाते हैं। यह प्रवृत्ति आज भी बनी हुई है।