हिंदू राष्ट्र की आर्थिक राजनीति: चढ़ावे और मार्केटिंग का खेल
हिंदू राष्ट्र की वास्तविकता
हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को सोनम वांगचुक या जीडी अग्रवाल जैसे व्यक्तियों से नहीं, बल्कि अडानी, अंबानी और अन्य प्रभावशाली लोगों से जोड़ा जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चिंता इन्हीं आर्थिक शक्तियों के इर्द-गिर्द घूमती है, क्योंकि यह सब कुछ पैसे के इर्द-गिर्द ही घूमता है। कलियुग में भगवान की उपासना अब तप से नहीं, बल्कि मार्केटिंग से होती है।
पिछले बारह वर्षों में कई महत्वपूर्ण घटनाएं हुई हैं। चाहे वह 'श्वेत अर्थव्यवस्था' का समय हो या 'गंगा शववाहिनी' का दौर, हर चरण में मार्केटिंग पर सबसे अधिक निवेश हुआ है। इसने अडानी और अंबानी को नए आर्थिक दिग्गजों के रूप में उभारा। भारत अब डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनफिंग जैसे वैश्विक नेताओं के लिए एक विशाल बाजार बन गया है।
जब अडानी दुनिया के सबसे बड़े धनकुबेरों में शामिल हुए, तब भक्तों ने इसे हिंदू समुदाय की उपलब्धि माना। लेकिन जब इस चमक की परतें उखड़ीं, तब भी शेयर बाजार ने करोड़ों युवाओं को अपनी किस्मत आजमाने का सपना दिखाया। इससे किसका कितना नुकसान हुआ, यह एक अलग मुद्दा है। लेकिन इस प्रक्रिया ने भक्ति को और मजबूत किया।
वास्तव में, हिंदू राष्ट्र की स्थिरता के कई कारणों में मंदिरों में चढ़ावे और मार्केटिंग का जाल शामिल है। लुटियंस दिल्ली का नया 'सेवा तीर्थ' केवल जवाबदेही से मुक्त नहीं है, बल्कि यह एक ऐतिहासिक लूट का प्रतीक बन गया है।
राम मंदिर से जुड़े विवाद या चंपत राय जैसे प्रसंग केवल राजनीतिक खेल का हिस्सा हैं। असली खेल उन खरबपतियों और वैश्विक नेताओं का है, जिन्होंने भारत को आर्थिक रूप से पराश्रित बना दिया है।