हिमंत बिस्व सरमा फिर से असम के मुख्यमंत्री बनने की ओर
असम विधानसभा चुनाव परिणाम
असम विधानसभा चुनाव परिणाम: असम के विधानसभा चुनावों के नतीजे आना शुरू हो गए हैं। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने एक बार फिर से प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है, और हिमंत बिस्व सरमा एक बार फिर मुख्यमंत्री बनने की तैयारी में हैं। 126 सीटों वाली असम विधानसभा में भाजपा ने बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया है, जबकि कांग्रेस काफी पीछे रह गई है। वर्तमान में, भाजपा 97 सीटों पर आगे चल रही है, और कई सीटों के परिणाम भी आ चुके हैं।
यह पहली बार नहीं है जब हिमंत बिस्व सरमा भाजपा का नेतृत्व कर रहे हैं। उन्होंने 2016 से इस भूमिका को निभाना शुरू किया था, लेकिन उन्हें मुख्यमंत्री बनने का पहला अवसर 2021 में मिला। अब, वह फिर से असम के मुख्यमंत्री के रूप में अपनी जिम्मेदारियों को निभाने के लिए तैयार हैं।
हिमंत बिस्व सरमा का परिचय
हिमंत बिस्व सरमा के बारे में जानें:
हिमंत बिस्व सरमा वर्तमान में असम के मुख्यमंत्री हैं। उनका जन्म 1 फरवरी 1969 को जोरहाट में हुआ था। बाद में उनका परिवार गुवाहाटी के उलुबारी और गांधीबस्ती में बस गया। उनका परिवार नलबाड़ी जिले के लतीमा से संबंधित है और उनके छह भाई-बहन हैं। राजनीति में कदम रखने से पहले, उन्होंने शिक्षा, छात्र नेतृत्व और वकालत में अनुभव प्राप्त किया।
छात्र राजनीति से शुरुआत
छात्र राजनीति में प्रवेश:
हिमंत बिस्व सरमा ने छात्र राजनीति से अपने करियर की शुरुआत की। इस दौरान, वे प्रभावशाली रहे और अपने भाषण कौशल और रणनीतिक सोच के कारण ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) के सदस्य बने। स्कूल के दिनों में ही वे कॉटन कॉलेज में आसू के मुख्य कार्यालय में नियमित रूप से जाते थे। 1987 में, 18 साल की उम्र में, उन्हें कॉटन कॉलेज का सहायक महासचिव चुना गया। छात्र राजनीति में उनकी गहरी पैठ बनी और वे 1988-89, 1989-90 और 1991-92 में तीन बार कॉटन कॉलेज छात्र संघ के महासचिव बने।
कांग्रेस में शामिल होने की कहानी
कांग्रेस में शामिल होने का सफर:
ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) से मतभेद के कारण, उन्होंने अपना रास्ता बदल लिया। इसके बाद, तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री ने उन पर ध्यान दिया। सरमा ने राज्यभर के छात्रों और कॉलेज यूनियनों के साथ संपर्क बनाकर कांग्रेस को मजबूत करने में मदद की। इसके चलते, वे सैकिया के करीबी युवा नेताओं में शामिल हो गए।
1996 में, उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर जलुकबारी सीट से अपना पहला विधानसभा चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। 2001 में, उन्होंने फिर से जलुकबारी निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ा और अपने पूर्व गुरु भृगु कुमार फुकन को हराकर पहली बार विधायक बने। इसके बाद, उन्होंने 2006 और 2011 में भी लगातार जीत हासिल की।
हालांकि, 2011 के आसपास कांग्रेस में सरमा का पतन शुरू हुआ। उन्होंने युवा विधायकों का एक गुट बनाकर मुख्यमंत्री पद की आकांक्षा जताई, जबकि तरुण गोगोई अपने बेटे गौरव गोगोई को उत्तराधिकारी के रूप में बढ़ावा देने लगे, जिससे दोनों के बीच दरार आ गई। इसके बाद, उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी।