बिहार में सम्राट चौधरी बने मुख्यमंत्री, नई सरकार के सामने चुनौतियाँ
मुख्यमंत्री के रूप में सम्राट चौधरी का शपथ ग्रहण
पटना: बिहार की राजनीतिक परिदृश्य में एक नया अध्याय आरंभ हुआ है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बुधवार को बिहार के 24वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। उनके साथ जदयू के बिजेंद्र प्रसाद यादव और विजय कुमार चौधरी ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण की। शपथ लेने के तुरंत बाद सम्राट चौधरी राज्य सचिवालय पहुंचे और मुख्यमंत्री कार्यालय में अपनी कुर्सी संभाली। इसके बाद वे प्रदेश भाजपा कार्यालय गए, जहां कार्यकर्ताओं ने उनका भव्य स्वागत किया।
तीन साल पुराना नारा आज हकीकत
2023 में, 2 मई को बेगूसराय के दिनकर भवन में सम्राट चौधरी के अभिनंदन समारोह में केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने एक नारा लगवाया था- 'बिहार का नेता कैसा हो?' कार्यकर्ताओं ने उत्तर दिया- 'सम्राट चौधरी जैसा हो!' उस समय नीतीश कुमार महागठबंधन के साथ सरकार चला रहे थे। गिरिराज सिंह ने कहा था कि बिहार को योगी आदित्यनाथ जैसा मुख्यमंत्री चाहिए, लेकिन नारा सम्राट चौधरी के नाम पर लगाया गया। आज, तीन साल बाद वही नारा सच हो गया है।
सम्राट चौधरी का राजनीतिक सफर
सम्राट चौधरी मुंगेर जिले के निवासी हैं। उनके पिता, शकुनी चौधरी, भी एक प्रमुख नेता और सांसद रहे हैं। सम्राट ने अपनी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत राजद से की और राबड़ी देवी की सरकार में मंत्री रहे। बाद में वे जदयू में शामिल हुए और 2017 में भाजपा में आए। उन्होंने बिहार भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में पार्टी को मजबूत किया और नीतीश सरकार में उपमुख्यमंत्री तथा वित्त मंत्री के रूप में कार्य किया। लव-कुश (कुर्मी-कोइरी) समाज से आने वाले सम्राट को भाजपा का प्रमुख ओबीसी चेहरा माना जाता है।
'लव-कुश' राजनीति का नया अध्याय
नीतीश कुमार और सम्राट चौधरी के पिता, शकुनी चौधरी ने समता पार्टी के समय 'लव-कुश' की राजनीति की नींव रखी थी। नीतीश लव (कुर्मी) समुदाय के प्रतीक बने, जबकि सम्राट कुशवाहा (कोइरी) समुदाय के प्रमुख नेता के रूप में उभरे हैं। सम्राट चौधरी ने 2023 में लव-कुश समाज को आश्वासन दिया था कि सत्ता में उनका प्रतिनिधित्व बना रहेगा। आज उनका यह वादा पूरा हो गया है। बिहार में अब 'सम्राट युग' की शुरुआत मानी जा रही है।
नई सरकार की चुनौतियाँ
सम्राट चौधरी ने शपथ लेते ही मुख्य सचिव और अन्य अधिकारियों के साथ बैठक की। नई सरकार के सामने विकास, रोजगार, कानून-व्यवस्था और जातीय समीकरण संभालने की बड़ी चुनौतियाँ हैं। भाजपा और जदयू के गठबंधन की मजबूती भी परीक्षा की घड़ी में है। कार्यकर्ताओं के बीच 'बुलडोजर बाबा' जैसे नारे गूंजे, लेकिन अब असली परीक्षा विकास और सुशासन देने की है। बिहारवासी नई सरकार से तेज प्रगति और बेहतर भविष्य की उम्मीद कर रहे हैं।