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दिल्ली में भारतीय सेना के जवान सिकंदर सिंह का निधन

दिल्ली में भारतीय सेना के जवान नायक सिकंदर सिंह का अचानक हार्ट अटैक से निधन हो गया, जिससे उनके परिवार में गहरा दुख छा गया। उनकी पत्नी रमनजीत कौर ने बताया कि उन्होंने अपने पति से चार दिन पहले बात की थी, जिसमें उन्होंने सीने में दर्द की शिकायत की थी। सिकंदर का जीवन संघर्ष और परिवार के प्रति समर्पण से भरा था। जानें उनके जीवन की कहानी और परिवार की स्थिति के बारे में।
 

दिल्ली में अचानक हार्ट अटैक से निधन


भारतीय सेना के नायक सिकंदर सिंह का दिल्ली में ड्यूटी के दौरान अचानक हार्ट अटैक से निधन हो गया। तिरंगे में लिपटे उनके पार्थिव शरीर को देखकर पत्नी और परिवार के सदस्य गहरे दुख में डूब गए। अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में ग्रामीण, रिश्तेदार और सेना के अधिकारी शामिल हुए।


अंतिम बातचीत और परिवार का दुख

सिकंदर सिंह की पत्नी, रमनजीत कौर, ने बताया कि उन्होंने अपने पति से चार दिन पहले फोन पर बात की थी। उस बातचीत में उन्होंने सीने में दर्द की शिकायत की थी। यह उनकी परिवार के साथ आखिरी बातचीत थी। रमनजीत का कहना है कि वे अपनी दोनों बेटियों से अंतिम समय में बात नहीं कर पाए। अचानक हुई इस घटना ने पूरे परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया।


पत्नी की शिक्षा में सहयोग

रमनजीत ने बताया कि उनके पति हमेशा परिवार के विकास के लिए प्रेरित करते थे। शादी के बाद, उन्होंने उन्हें एमए और बीएड की पढ़ाई पूरी करने के लिए प्रोत्साहित किया और हर कदम पर उनका साथ दिया।


उन्होंने कहा कि उन्हें अपने पति पर गर्व है, जिन्होंने देश की सेवा में अपना जीवन समर्पित किया। अब उनकी इच्छा है कि सरकार उनकी दोनों बेटियों के भविष्य की जिम्मेदारी उठाने में मदद करे। सिकंदर का विवाह लगभग पांच वर्ष पहले हुआ था और उनके परिवार में पत्नी के अलावा दो बेटियां हैं, जिनकी उम्र ढाई वर्ष और आठ महीने है।


सेना में भर्ती का संघर्ष

सिकंदर सिंह, जो जगराओं के निकट गगड़ा गांव के निवासी थे, ने लगभग 16 वर्ष पहले भारतीय सेना की 5 सिख लाइट इन्फैंट्री में भर्ती होने का सपना देखा था। वे एक साधारण मजदूर परिवार से थे। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद, उन्होंने हार नहीं मानी और कड़ी मेहनत से सेना में स्थान प्राप्त किया।


तीन भाइयों में सबसे बड़े होने के नाते, उन्होंने कम उम्र में ही परिवार की जिम्मेदारियों को संभाल लिया। अपने पिता के साथ मिलकर उन्होंने परिवार का सहारा बनने का प्रयास किया। जनवरी में, सिकंदर 45 दिन की छुट्टी पर घर आए थे और मार्च में ड्यूटी पर लौट गए थे। इसके बाद, वे सीधे तिरंगे में लिपटे हुए घर लौटे।