अयोध्या की हनुमानगढ़ी में नमाज का विवाद: 22 साल पुरानी कहानी का सच
अयोध्या में नमाज का विवाद
अयोध्या: जब भी हनुमानगढ़ी का नाम लिया जाता है, सोशल मीडिया पर एक पुराना दावा फिर से चर्चा में आ जाता है - "मंदिर परिसर में नमाज अदा की गई थी"। यह विवाद नया नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें 22 साल पहले की हैं और यह केवल नमाज तक सीमित नहीं है। 2003 में अयोध्या विवाद को बातचीत के माध्यम से सुलझाने का प्रयास किया जा रहा था। इसी संदर्भ में, हनुमानगढ़ी के महंत ज्ञान दास ने अपने आश्रम में रोजा इफ्तार का आयोजन किया।
2003 में इफ्तार का आयोजन
इस इफ्तार कार्यक्रम में बाबरी मस्जिद के मुद्दई हाशिम अंसारी, मुस्लिम नेता सादिक अली उर्फ बाबू टेलर सहित कई मुस्लिम प्रतिनिधियों ने भाग लिया। उस समय इसे हिंदू-मुस्लिम भाईचारे को बढ़ावा देने की एक पहल माना गया। महंत ज्ञान दास को संवाद के लिए जाने जाने वाले संतों में गिना जाता था और वे अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष भी रह चुके थे। उनका मानना था कि दोनों समुदायों के बीच विश्वास स्थापित होना चाहिए।
इफ्तार के बाद विवाद का आरंभ
इफ्तार के बाद विवाद उत्पन्न हुआ जब आरोप लगाया गया कि कार्यक्रम के दौरान हनुमानगढ़ी परिसर में नमाज भी अदा की गई। इसी से मामला तूल पकड़ गया। हनुमानगढ़ी के एक अन्य महंत धर्मदास ने इसका विरोध किया, यह कहते हुए कि मंदिर परिसर में इस तरह का आयोजन उचित नहीं है। मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच तक पहुंच गया।
कोर्ट ने सुनवाई के बाद हनुमानगढ़ी परिसर में रोजा इफ्तार आयोजित करने पर रोक लगा दी। इसके बाद 2005 तक इस मुद्दे को लेकर काफी तनाव बना रहा। बढ़ते विवाद को देखते हुए महंत ज्ञान दास ने स्वयं कहा कि भविष्य में हनुमानगढ़ी में इफ्तार का आयोजन नहीं होगा।
महंत ज्ञान दास की पहल और परिणाम
महंत ज्ञान दास अयोध्या विवाद के समाधान के लिए मुस्लिम पक्ष से संवाद के पक्षधर थे। उन्होंने कई बार कहा कि समस्या का समाधान संवाद से ही निकलेगा। इसी सोच के तहत उन्होंने मुस्लिम समुदाय के बच्चों और लोगों से संपर्क बढ़ाने का प्रयास किया। लेकिन 2003 का इफ्तार कार्यक्रम उनके लिए विवाद का कारण बन गया। कोर्ट के स्टे के बाद हनुमानगढ़ी में ऐसे आयोजनों पर रोक लग गई।
आज फिर क्यों हो रही है चर्चा?
वास्तव में, 22 साल बाद भी हनुमानगढ़ी में "नमाज" का मुद्दा समय-समय पर उठता रहता है। सोशल मीडिया पर अक्सर यह लिखा जाता है कि मंदिर में नमाज हुई थी। लेकिन सच्चाई यह है कि इसकी शुरुआत 2003 के इफ्तार कार्यक्रम से जुड़े आरोपों से हुई थी।
बाद में मामला कोर्ट में गया और परिसर में ऐसे आयोजनों पर रोक लग गई। इस प्रकार, आज जो छोटी सी बात वायरल होती है, उसकी पृष्ठभूमि काफी लंबी और कानूनी है। यह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि अयोध्या में सौहार्द की कोशिश और उसके परिणामों की कहानी है।