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उत्तराखंड में 'धामी मॉडल': आपदा प्रबंधन से पुनर्वास तक का नया दृष्टिकोण

उत्तराखंड में हालिया बाढ़ के बाद, राज्य सरकार ने 'धामी मॉडल' के तहत आपदा प्रबंधन और पुनर्वास की नई दिशा अपनाई है। इस मॉडल के अंतर्गत, केवल तात्कालिक राहत कार्य नहीं किए गए, बल्कि दीर्घकालिक पुनर्वास और ढांचागत विकास पर भी ध्यान दिया गया है। इसमें आधुनिक तकनीक का उपयोग, सुरक्षित हिमालयी ढांचे का निर्माण, और प्रभावित परिवारों की आजीविका बहाली शामिल है। जानें कैसे यह पहल प्रभावितों के जीवन को पटरी पर लाने में मदद कर रही है।
 

उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन की नई दिशा


उत्तराखंड: धाराली और थराली में हाल ही में आई भीषण बाढ़ और मलबे के प्रवाह के बाद, राज्य सरकार ने मानव जीवन की सुरक्षा और नागरिक सुविधाओं को बहाल करने के लिए तात्कालिक कदम उठाए। इस प्रयास ने केवल तात्कालिक राहत कार्यों तक सीमित नहीं रहकर, पीड़ितों के दीर्घकालिक पुनर्वास पर भी ध्यान केंद्रित किया है। अब इसे 'धामी मॉडल' के रूप में जाना जा रहा है, जिसमें आपदा के बाद केवल अस्थायी सहायता नहीं दी जाती, बल्कि भविष्य की चुनौतियों के अनुसार ढांचागत विकास पर जोर दिया जाता है।


सुरक्षित हिमालयी ढांचे का निर्माण

पुनर्निर्माण के इस चरण में प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को कम करने की रणनीतियाँ भी शामिल हैं। राज्य में आधुनिक तकनीक, मौसम ट्रैकिंग, सैटेलाइट मैपिंग और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों पर आधारित एक मजबूत आपदा प्रबंधन ढांचा स्थापित किया गया है।


पहाड़ी ढालों का स्थिरीकरण, भूस्खलन रोधी दीवारें, और नदियों के तटबंधों का सुदृढ़ीकरण सुनिश्चित किया जा रहा है ताकि भविष्य में आने वाले प्रवाह को सहन किया जा सके।


रेस्क्यू से बुनियादी ढांचे की बहाली

आपदा के तुरंत बाद, राज्य आपदा मोचन बल (SDRF), राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF), भारतीय सेना और स्थानीय प्रशासन ने मिलकर राहत कार्य शुरू किया। प्रभावित क्षेत्रों में चिकित्सा सेवाओं और बुनियादी सुविधाओं को बहाल करने का कार्य तेजी से किया गया। धाराली, थराली, हर्षिल और भटवाड़ी जैसे दूरदराज के पहाड़ी क्षेत्रों में सड़कें, बिजली और पेयजल लाइनों का ध्वस्त होना समुदाय के लिए गंभीर समस्या बन गया। राज्य सरकार ने राहत और पुनर्वास कार्यों के लिए 33 करोड़ रुपये से अधिक की राशि स्वीकृत की है।


पुनर्वास में आजीविका बहाली पर विशेष जोर

पुनर्वास प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण पहलू आजीविका को पुनः स्थापित करना रहा है। आवंटित राशि में से 16 करोड़ रुपये से अधिक का उपयोग पशुपालन, सिंचाई, उद्यान, कृषि, ग्रामीण विकास, ऊर्जा, पर्यटन और लोक निर्माण के लिए किया गया।


इसके अलावा, 17 करोड़ रुपये से अधिक की राशि सीधे प्रभावित परिवारों को वित्तीय सहायता के रूप में दी गई। पहाड़ी अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण सेब के बगीचों की क्षतिपूर्ति, भेड़-बकरी पालन के लिए प्रोत्साहन, बीज और पौधों का वितरण, और कृषि योग्य भूमि के सुधार पर विशेष ध्यान दिया गया है।


जोशीमठ संकट में भी दिखा यही रुख

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जोशीमठ भू-धंसाव संकट के दौरान भी पुनर्वास के इस दृष्टिकोण को अपनाया गया। प्रभावित परिवारों को सुरक्षित आश्रयों में स्थानांतरित किया गया और नगर को विभिन्न जोन में विभाजित किया गया। विस्थापित परिवारों को मासिक किराया भत्ता, अंतरिम सहायता, और पानी-बिजली के बिलों में छूट प्रदान की गई। इसरो (ISRO), आईआईटी रुड़की और जीएसआई (GSI) जैसी संस्थाओं की रिपोर्ट के आधार पर 1,658 करोड़ रुपये की वृहद पुनर्निर्माण योजना तैयार की गई।