क्या लिव-इन कपल को मिलेगी सुरक्षा? इलाहाबाद हाई कोर्ट का अहम फैसला
इलाहाबाद हाई कोर्ट का निर्णय
नई दिल्ली: क्या लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों को पुलिस सुरक्षा मिल सकती है, यदि पुरुष साथी की उम्र शादी के लिए निर्धारित 21 साल से कम हो? इसी संदर्भ में इलाहाबाद हाई कोर्ट में जस्टिस गरिमा प्रसाद की बेंच के समक्ष एक मामला प्रस्तुत हुआ। कोर्ट ने लिव-इन कपल द्वारा सुरक्षा की मांग करने वाली याचिका को खारिज कर दिया।
कोर्ट का तर्क
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह ऐसे रिश्तों को सुरक्षा नहीं दे सकता जो शादी के विकल्प के रूप में कार्य करते हैं। वर्तमान कानूनी ढांचे के अनुसार, ऐसी शादी को वैध नहीं माना जाता। कोर्ट ने यह भी कहा कि चूंकि पुरुष याचिकाकर्ता की उम्र 19 वर्ष है, इसलिए उसे बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 के तहत 'बच्चा' माना जाएगा।
मामले की पृष्ठभूमि
यह याचिका एक कपल द्वारा दायर की गई थी, जिन्होंने बताया कि वे लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं। याचिकाकर्ता नंबर 1 एक 20 वर्षीय मुस्लिम महिला है, जबकि याचिकर्ता नंबर 2 एक 19 वर्षीय पुरुष है जो अनुसूचित जाति (SC) से संबंधित हिंदू परिवार से है।
पिता द्वारा धमकियों का आरोप
याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि लड़की का पिता उन्हें धमकियां दे रहा है और उनके रिश्ते को समाप्त करने का दबाव बना रहा है। उन्होंने कोर्ट से अनुरोध किया कि परिवार के सदस्यों को उनके साथ रहने में हस्तक्षेप करने से रोका जाए और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उनके जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
शादी की न्यूनतम उम्र
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि वे विशेष विवाह अधिनियम 1954 के तहत शादी नहीं कर सकते क्योंकि पुरुष याचिकाकर्ता ने अभी तक शादी की न्यूनतम उम्र 21 साल पूरी नहीं की है। याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क किया कि चूंकि दोनों वयस्क हैं (18 वर्ष से अधिक), उन्हें अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने का अधिकार है, चाहे वह शादी के बंधन में हो या न हो। उन्होंने कोर्ट के पिछले आदेशों का भी उल्लेख किया, जिनमें लिव-इन कपल को सुरक्षा प्रदान की गई थी।