दशहरा: अच्छाई की जीत के साथ संवेदनशीलता का संदेश
दशहरा का गहरा अर्थ
नई दिल्ली: दशहरा केवल बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह आत्म-विश्लेषण, मानवीय भावनाओं को समझने और समाज में प्रेम, करुणा और भाईचारे को बढ़ावा देने का एक अवसर भी है। जब पूरी दुनिया उत्सव की खुशियों में लिपटी होती है, तब उन लोगों को याद करना आवश्यक है, जो अपने जीवन में संघर्ष, अकेलेपन, दुख और निराशा का सामना कर रहे हैं। इसी भावना के साथ प्रो. एम. डी. रे ने दशहरे के मौके पर लोगों से संवेदनशीलता, आत्म-चिंतन और मानवीय मूल्यों को अपनाने की अपील की है।
त्योहार की असली सार्थकता
त्योहार की सच्ची सार्थकता और आंतरिक बुराइयों पर विजय
प्रो. एम. डी. रे ने अपने संदेश में कहा कि त्योहार का असली महत्व केवल उत्सव मनाने में नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन में खुशियों और उम्मीद की किरण जगाने में है। उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि वे उस क्रोध पर विजय पाने का साहस जुटाएं जो अपने प्रियजनों को चोट पहुंचाता है; उस अहंकार को छोड़ दें, जो रिश्तों में दूरियां पैदा करता है; और उस उदासीनता से बाहर निकलें, जो हमें दूसरों के दर्द को नजरअंदाज करना सिखाती है। उन्होंने कहा कि किसी दुखी व्यक्ति के लिए सांत्वना के दो शब्द, अकेलेपन से जूझ रहे इंसान के लिए एक फोन कॉल और निराश व्यक्ति के लिए मुश्किल समय में थामे रखा गया हाथ भी किसी बड़े सहारे से कम नहीं है। कभी-कभी छोटी-सी पहल किसी टूटते हुए इंसान के जीवन में नई उम्मीद जगा सकती है।
संवेदनशीलता और मानवता
संवेदना और सच्ची इंसानियत
उनका संदेश है कि यदि कोई व्यक्ति दुख में है, तो उसके पास बैठना भी संवेदनशीलता है; यदि कोई अकेला है, तो उसे यह एहसास दिलाना कि वह महत्वपूर्ण है, अपने आप में एक बड़ी मानव सेवा है। वहीं, उम्मीद खो रहे व्यक्ति का साथ निभाना सच्ची इंसानियत की पहचान है। प्रो. एम. डी. रे ने सभी को शांतिपूर्ण और मंगलमय दशहरे की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि अच्छाई की विजय की शुरुआत हमारे अपने विचारों, व्यवहार और कर्मों से होनी चाहिए। जब हमारे भीतर प्रेम, सहानुभूति और करुणा का दीप जलता है, तभी उसकी रोशनी दूसरों के जीवन तक पहुंचती है।