नीम करौरी बाबा: वृंदावन में प्रेम और भक्ति का प्रतीक
नीम करौरी बाबा का वृंदावन से गहरा संबंध
वृंदावन: वर्तमान में फिल्म हनुमान अंश के कारण संत नीम करौरी बाबा चर्चा का विषय बने हुए हैं। उनका वृंदावन से एक विशेष और गहरा संबंध रहा है। कैंची धाम के लिए प्रसिद्ध नीम करौरी बाबा की महासमाधि उत्तराखंड में नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण की नगरी वृंदावन में स्थित है। परिक्रमा मार्ग पर उनका आश्रम आज भी भक्तों के लिए आस्था का एक प्रमुख केंद्र है। यह जानना दिलचस्प है कि नीम करौरी बाबा कौन थे, वे वृंदावन कब आए और उन्होंने अपनी अंतिम यात्रा के लिए इस स्थान को क्यों चुना।
हनुमान जी के परम भक्त
नीम करौरी बाबा का असली नाम लक्ष्मी नारायण शर्मा था। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के अकबरपुर गांव में एक संपन्न परिवार में हुआ। युवा अवस्था में ही उन्होंने सांसारिक जीवन से विरक्ति अपनाई और आध्यात्मिक मार्ग पर चल पड़े। उन्हें हनुमान जी का परम भक्त माना जाता था, और उनके अनुयायी उन्हें हनुमान जी का अवतार मानते हैं। उनके लाखों भक्त देश-विदेश में फैले हुए हैं। बाबा का जीवन किसी एक स्थान तक सीमित नहीं रहा; वे विभिन्न स्थानों पर भ्रमण करते रहे और कई आश्रमों और हनुमान मंदिरों की स्थापना में शामिल रहे।
वृंदावन में आश्रम और मंदिर
वृंदावन में उनका आश्रम और मंदिर स्थापित था
नीम करौरी बाबा का वृंदावन से संबंध उनके जीवन के अंतिम दिनों से पहले का था। यहां उनका आश्रम और मंदिर स्थापित था, जिसमें पहला मंदिर 1967 में शुरू हुआ। यह आश्रम धीरे-धीरे बाबा के प्रमुख आध्यात्मिक केंद्रों में से एक बन गया। यही वह स्थान है, जिसे बाबा ने अपनी अंतिम यात्रा के लिए चुना।
महासमाधि का स्थान
वृंदावन में रामकृष्ण मिशन अस्पताल में उन्होंने अपना शरीर त्याग किया
कहा जाता है कि 1973 में बाबा ने वृंदावन में प्रवेश किया। उनकी अंतिम यात्रा कैंची धाम से शुरू हुई और वे ब्रजभूमि पहुंचे। उनके अंतिम समय की तारीख को लेकर विभिन्न विवरण हैं, लेकिन 11 सितंबर 1973, अनंत चतुर्दशी को उनकी महासमाधि से जोड़ा जाता है। उन्होंने रामकृष्ण मिशन अस्पताल में अपना शरीर त्यागा।
महासमाधि मंदिर की परंपरा
बाबा की महासमाधि से जुड़ी एक दिलचस्प बात यह है कि 1973 में चैत्र नवरात्र के दौरान उन्होंने वृंदावन आश्रम में नौ दिवसीय यज्ञ कराया था। उस समय किसी को नहीं पता था कि यही स्थान भविष्य में उनकी महासमाधि का स्थल बनेगा। उनके शरीर त्यागने के बाद भक्तों ने उसी स्थान पर उनका अंतिम संस्कार किया और बाद में वहां महासमाधि मंदिर का निर्माण किया। बाबा की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा 9 फरवरी 1981 को बसंत पंचमी के अवसर पर हुई।
श्रद्धा का केंद्र
महासमाधि मंदिर आज भी श्रद्धा और आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है
नीम करौरी बाबा का नाम सुनते ही कैंची धाम की याद आती है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उनकी असली महासमाधि वृंदावन में है। हर साल उनके निर्वाण दिवस पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु वृंदावन स्थित आश्रम में आते हैं। यहां का महासमाधि मंदिर आज भी श्रद्धा और आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
बाबा का संदेश
नीम करौरी बाबा के भक्त केवल भारत में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी हैं। उनका सबसे बड़ा संदेश था प्रेम, सेवा और भगवान का स्मरण करना। उनके जीवन से जुड़ी अनेक कथाएं आज भी भक्तों के बीच प्रचलित हैं। कैंची धाम विश्व प्रसिद्ध है, लेकिन उनकी अंतिम स्मृतियां वृंदावन की पावन भूमि में हैं। यही कारण है कि नीम करौरी बाबा की चर्चा करते समय वृंदावन का नाम भी श्रद्धा से लिया जाना चाहिए।
कृष्ण की नगरी में अंतिम यात्रा
वृंदावन के परिक्रमा मार्ग स्थित बाबा नीम करौरी महाराज का महासमाधि मंदिर इस बात का प्रमाण है कि प्रेम और सेवा का संदेश देने वाले संत ने अपनी अंतिम यात्रा के लिए कृष्ण की नगरी को चुना।