ब्रज के संत रमेश बाबा का निधन: गोसेवा और पर्यावरण संरक्षण में अद्वितीय योगदान
मथुरा में संत रमेश बाबा का निधन
मथुरा: ब्रज के प्रसिद्ध संत और पद्मश्री से सम्मानित रमेश बाबा का निधन मंगलवार को हो गया। 88 वर्ष की आयु में, वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे और उन्होंने बरसाना स्थित मान मंदिर में अंतिम सांस ली। उनके निधन की सूचना से ब्रज क्षेत्र में शोक की लहर फैल गई है। संत समाज, श्रद्धालु और गोसेवा से जुड़े लोग उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। रमेश बाबा ने अपने जीवन को गोसेवा, ब्रज के संरक्षण और पर्यावरण की रक्षा के लिए समर्पित किया।
जन्म और वैराग्य की यात्रा
रमेश बाबा का जन्म 1938 में प्रयागराज में हुआ। उनके पिता, प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य बलदेव प्रसाद शुक्ल और माता हेमेश्वरी देवी थीं। कहा जाता है कि संतान की इच्छा से उनके माता-पिता ने रामेश्वरम में पुत्र कामेष्टि यज्ञ किया था। शिव कृपा से उनका जन्म पौष कृष्ण सप्तमी को हुआ। उनके पिता ने भविष्यवाणी की थी कि वे ब्रह्मचारी रहेंगे। प्रयागराज में शिक्षा के दौरान उनके भीतर वैराग्य की भावना विकसित हुई। उन्होंने दो बार ब्रज आने का प्रयास किया, लेकिन मां के प्यार ने उन्हें रोक लिया। अंततः तीसरी बार वे गृह त्यागकर ब्रजभूमि पहुंचे।
बरसाना में भक्ति साधना
1954 में, केवल 16 वर्ष की आयु में, रमेश बाबा बरसाना पहुंचे। यहां उन्होंने राधारानी मंदिर में मृदंग बजाकर भक्ति साधना शुरू की। बाद में, उन्होंने ब्रह्मांचल पर्वत पर मान मंदिर आश्रम की स्थापना की और ठाकुर मान बिहारी की सेवा में लीन हो गए। उनका जीवन धीरे-धीरे ब्रजवासियों की सेवा में समर्पित हो गया। 1968 में, उन्होंने ब्रजवासियों के साथ राधारानी ब्रजयात्रा की शुरुआत की, जिसमें हर साल लगभग 20,000 श्रद्धालु शामिल होते हैं। श्रद्धालुओं के लिए रहने और भोजन की व्यवस्था मान मंदिर आश्रम द्वारा निशुल्क की जाती है।
पर्यावरण संरक्षण का संघर्ष
रमेश बाबा ने ब्रज के पर्यावरण और पहाड़ियों के संरक्षण के लिए कई संघर्ष किए। उन्होंने गहवरवन में पेड़ों की कटाई के खिलाफ अभियान चलाया और बरसाना से राजस्थान तक अवैध खनन के खिलाफ आंदोलन किया। उनके प्रयासों से इस मुद्दे को व्यापक पहचान मिली और 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने ब्रज की पहाड़ियों में खनन पर रोक लगाने का आदेश दिया। उन्होंने ब्रज के प्राचीन कुंडों और सरोवरों के संरक्षण के लिए भी निरंतर काम किया।
गोसेवा और पद्मश्री सम्मान
गोसेवा के क्षेत्र में भी रमेश बाबा का योगदान महत्वपूर्ण रहा। 2007 में, उन्होंने माताजी गोशाला की स्थापना की, जिसमें दो गोवंश थे। आज यह गोशाला एशिया की सबसे बड़ी गोशालाओं में से एक मानी जाती है, जिसमें लगभग 65,000 गोवंश का संरक्षण किया जाता है। गोसेवा और पर्यावरण संरक्षण में उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 2019 में पद्मश्री से सम्मानित किया। रमेश बाबा के निधन से ब्रज ने एक ऐसे संत को खो दिया है, जिन्होंने साधना के साथ-साथ गो, वन, पहाड़ और जल संरक्षण को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया था।