भोपाल हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: भोजशाला को मां सरस्वती का मंदिर घोषित किया गया
भोजशाला का नया अध्याय
भोपाल: हाल ही में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने भोजशाला को मां सरस्वती का मंदिर मान्यता दी है। इस निर्णय के बाद भोजशाला एक बार फिर से चर्चा का विषय बन गई है, हालांकि यह मामला अयोध्या, काशी या मथुरा से भिन्न है। इसके साथ ही, यहां मां सरस्वती की प्राचीन मूर्ति से जुड़ा एक दिलचस्प रहस्य भी है, जो धार से लंदन तक फैला हुआ है।
भोजशाला का ऐतिहासिक महत्व
भोजशाला मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित है और यह 11वीं शताब्दी में परमार राजवंश के महान राजा भोज की राजधानी थी। राजा भोज एक विद्वान, कला प्रेमी और लेखक थे, जिन्होंने भोजशाला को संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र बनाया।
यहां मां वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर भी था, जहां छात्र पढ़ाई शुरू करने से पहले देवी की पूजा करते थे। लेकिन 14वीं-15वीं शताब्दी में आक्रमणकारियों ने इसे नष्ट कर दिया और कमाल मौला मस्जिद का निर्माण किया।
अयोध्या-काशी से भिन्नता
यह मामला अन्य विवादों से अलग है क्योंकि भोजशाला 1909 से ASI (पुरातत्व सर्वेक्षण) के संरक्षण में है। विवाद 1902 से शुरू हुआ था। 2003 से हिंदुओं को मंगलवार और मुसलमानों को शुक्रवार को पूजा-नमाज की अनुमति थी। ASI के वैज्ञानिक सर्वे में हिंदू देवी-देवताओं की आकृतियां, संस्कृत शिलालेख और हवन कुंड मिले हैं। हाईकोर्ट ने इन्हीं सबूतों के आधार पर इसे मंदिर के रूप में मान्यता दी है।
मां सरस्वती की मूर्ति का रहस्य
राजा भोज ने भोजशाला में मां सरस्वती की एक अद्भुत मूर्ति स्थापित की थी, जो आक्रमण के बाद गायब हो गई। 1961 में प्रसिद्ध पुरातत्वविद डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर लंदन गए और ब्रिटिश म्यूजियम में एक मूर्ति देखी, जिसे 1875 में मेजर किंकेड द्वारा धार के महल खंडहर से लाया गया था।
डॉ. वाकणकर ने राजा भोज की पुस्तक 'समरांगण सूत्रधार' के साथ मूर्ति की शैली, मुद्रा, आभूषण और शिलालेख की तुलना की। सभी प्रमाण मेल खाते थे, जिससे उन्होंने साबित किया कि यह वही मूर्ति है जो राजा भोज ने भोजशाला में स्थापित की थी।
हाईकोर्ट का संदेश
हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि ब्रिटेन से इस मूर्ति को वापस लाने की प्रक्रिया को तेज किया जाए। भले ही मामला सुप्रीम कोर्ट में जाए, लेकिन मां सरस्वती की मूर्ति का मुद्दा विवाद से परे है। यह धार की सांस्कृतिक धरोहर है। जब यह मूर्ति वापस आएगी और अपने मूल स्थान पर स्थापित होगी, तब भोजशाला का असली इतिहास पूरा होगा।