वृंदावन के वात्सल्य ग्राम में मातृत्व का अनोखा उत्सव: अहोई अष्टमी पर माताएं रखती हैं निर्जला व्रत
मां और संतान का अनूठा बंधन
वृंदावन: मां और बच्चे का संबंध केवल रक्त से नहीं, बल्कि प्रेम, त्याग और समर्पण से भी बनता है। इसका जीवंत उदाहरण वृंदावन के वात्सल्य ग्राम में देखने को मिलता है। यहां अनाथ और बेसहारा बच्चों को न केवल छत मिली है, बल्कि उन्हें ऐसा परिवार मिला है, जहां मां की ममता, नानी का दुलार और भाई-बहनों का साथ भी नसीब हो रहा है। इन बच्चों के लिए मां की भूमिका निभाने वाली महिलाएं हर त्योहार को पारिवारिक परंपरा के साथ मनाती हैं। अहोई अष्टमी पर रविवार को ये माताएं अपनी संतानों की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए निर्जला व्रत रख रही हैं।
गोकुलम में 16 परिवारों के साथ पल रहे 148 बच्चे
वात्सल्य ग्राम में संचालित गोकुलम परिवार व्यवस्था में 16 परिवारों के बीच 148 बच्चों का पालन-पोषण हो रहा है। प्रत्येक परिवार में मां, नानी और मौसी की जिम्मेदारियां अलग-अलग महिलाओं को सौंपी गई हैं। ये महिलाएं बच्चों की परवरिश से लेकर उनकी शिक्षा, संस्कार और जीवन की जरूरतों तक का ध्यान रखती हैं। संस्थापक साध्वी ऋतंभरा ने इस व्यवस्था के माध्यम से उन बच्चों को परिवार देने का प्रयास किया, जिन्हें जन्म देने वाले माता-पिता का साथ नहीं मिल सका। यहां वर्षों से रह रहीं माताओं के लिए ये बच्चे अब किसी जिम्मेदारी का हिस्सा नहीं, बल्कि उनके जीवन का अभिन्न अंग बन चुके हैं।
20 साल से बच्चों को मां का प्यार दे रहीं सुमनलता और साधिका
वात्सल्य परिवार की मुखिया सुमनलता परमानंद बताती हैं कि वह करीब 20 वर्ष से यहां रह रही हैं। उनके परिवार में सात बच्चे हैं, जिनमें चार बेटे और तीन बेटियां हैं। उनका बड़ा बेटा शाश्वत 26 वर्ष का है और नौकरी कर रहा है। बच्चों के साथ बिताए वर्षों में कब वे उनके जीवन का हिस्सा बन गए, इसका एहसास भी नहीं हुआ। वह हर साल अहोई अष्टमी पर अपनी संतानों की दीर्घायु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। वहीं साधिका परमानंद बताती हैं कि वर्ष 2004 में वात्सल्य ग्राम आने के बाद उन्हें साध्वी ऋतंभरा का सानिध्य और आशीर्वाद मिला। उनके परिवार में छह बेटियां और एक बेटा है। सभी बच्चे बड़े हो चुके हैं और एक-दूसरे का सहारा बनकर रहते हैं। बच्चों की खुशहाली और समृद्धि के लिए वह पूरे विधि-विधान से व्रत करती हैं।
बच्चों की खुशहाली के लिए माताएं रखती हैं निर्जला व्रत
साधिका परमानंद के अनुसार, उन्हें वात्सल्य ग्राम आए करीब 20 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि वह अपने घर से दूर हैं। उनके परिवार में दस बच्चे हैं, जिनमें तीन बेटे और सात बेटियां हैं। बड़ी बेटी सिमरन बीए की पढ़ाई कर रही है, जबकि बड़ा बेटा फैशन डिजाइनिंग कर रहा है। वह बताती हैं कि अहोई अष्टमी का व्रत उनके लिए केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि बच्चों के प्रति ममता और समर्पण व्यक्त करने का अवसर है। दिनभर निर्जला व्रत रखने के बाद ध्रुव तारे को अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है। सभी माताएं साध्वी ऋतंभरा के सानिध्य में सामूहिक पूजन कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करती हैं।
बच्चों की संख्या के अनुसार पहनती हैं चांदी की माला
वात्सल्य ग्राम में अहोई अष्टमी की परंपरा का एक विशेष पक्ष भी है। यहां प्रत्येक मां बच्चों की संख्या के अनुसार चांदी की माला पहनती है। माला में बच्चों की संख्या से दोगुने मोती पिरोए जाते हैं। व्रत के दिन धारण की जाने वाली यह माला दीपावली तक पहनी जाती है। वात्सल्य ग्राम के प्रवक्ता डॉ. उमाशंकर राही ने बताया कि सभी माताएं सुबह से निर्जला व्रत रखती हैं। शाम को ध्रुव तारे को अर्घ्य देने और सामूहिक पूजन के बाद साध्वी ऋतंभरा का आशीर्वाद लेकर व्रत खोलती हैं। इस अवसर पर दीदी मां की ओर से माताओं को उपहार भी दिए जाते हैं। यहां अहोई अष्टमी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि उन भावनात्मक रिश्तों का उत्सव है, जो ममता और अपनत्व से बने हैं।