हरियाणा सरकार का नया नियम: ग्राम पंचायतों की भूमि पर निजी परियोजनाओं के लिए मिलेगी अनुमति
मुख्यमंत्री सैनी का प्रशासनिक बदलाव
चंडीगढ़. मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की सरकार ने ग्रामीण समुदाय के हितों की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक बदलाव किया है। हरियाणा की ग्राम पंचायतों की साझा भूमि पर अब कोई भी निजी कंपनी या व्यक्ति अपनी मर्जी से रास्ता नहीं बना सकेगा। नई व्यवस्था के अनुसार, किसी भी निजी परियोजना के लिए ग्राम पंचायत के 75% सदस्यों और ग्राम सभा के दो-तिहाई सदस्यों की लिखित मंजूरी आवश्यक होगी। यह निर्णय भू-माफियाओं और बिल्डरों पर अंकुश लगाने के लिए है, जो मिलकर गांव की कीमती भूमि का दुरुपयोग करते थे।
पानीपत की ग्राम पंचायत का अनूठा प्रस्ताव
पानीपत की सनौली खुर्द पंचायत ने पेश की मिसाल
इस नई नीति के तहत, पानीपत जिले के सनौली खुर्द से एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव सामने आया है। ग्राम पंचायत ने सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) के निर्माण के लिए भूमि के आदान-प्रदान का खाका प्रदेश सरकार को प्रस्तुत किया है। पंचायत अपनी 9 कनाल 3 मरला भूमि के बदले संबंधित कंपनी की 15 कनाल भूमि लेने के लिए तैयार है। इस भूमि की मौजूदा बाजार कीमत लगभग 4 करोड़ 57 लाख रुपये आंकी गई है। यहाँ भविष्य में कंक्रीट टैंक का निर्माण किया जाएगा, जिससे गांव की स्वच्छता में सुधार होगा और पंचायत की संपत्ति में भी वृद्धि होगी।
भूमि का स्वामित्व सुरक्षित रहेगा
जमीन का मालिकाना हक रहेगा सुरक्षित
हरियाणा सरकार ने स्पष्ट किया है कि रास्ता देने के नाम पर भूमि का सौदा नहीं किया जाएगा। नियम स्पष्ट हैं कि भूमि न तो बेची जाएगी और न ही इसे लोन के लिए कोलैटरल के रूप में इस्तेमाल किया जा सकेगा। भूमि का वास्तविक स्वामित्व हमेशा ग्राम पंचायत के पास रहेगा। इस निर्णय का सबसे बड़ा लाभ यह है कि अब निजी परियोजनाओं के रास्तों का उपयोग आम ग्रामीण भी कर सकेंगे। इससे गांवों में विकास के नए अवसर खुलेंगे और पंचायत फंड में पारदर्शिता आएगी।
ग्राम सभा की शक्ति में वृद्धि
ग्राम सभा की मजबूती और बिचौलियों का अंत
सरकार के इस निर्णय से गांवों में ग्राम सभा की शक्ति पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। अब सरपंच या कुछ रसूखदार लोग अकेले निर्णय नहीं ले सकेंगे। जब तक गांव के अधिकांश लोग सहमत नहीं होंगे, तब तक साझा भूमि पर कोई गतिविधि नहीं होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे ग्रामीण क्षेत्रों में कानूनी विवादों में कमी आएगी। किसानों और ग्रामीणों का अपनी साझा भूमि पर विश्वास बढ़ेगा क्योंकि अब हर निर्णय उनकी सहमति से लिया जाएगा।