कोकिला व्रत: पूजा विधि और महत्व
कोकिला व्रत, जो आषाढ़ माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है, भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा के लिए विशेष महत्व रखता है। इस दिन महिलाएं व्रत करती हैं, जिससे वैवाहिक जीवन में प्रेम और सुख बना रहता है। कुंवारी लड़कियां इस व्रत को योग्य जीवनसाथी की कामना के लिए करती हैं। जानें इस व्रत की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इसके महत्व के बारे में विस्तार से।
Jul 28, 2026, 08:27 IST
कोकिला व्रत का महत्व
आषाढ़ माह की पूर्णिमा का दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन महिलाएं कोकिला व्रत का आयोजन करती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत को करने से वैवाहिक जीवन में प्रेम, सुख और समृद्धि बनी रहती है। कुंवारी लड़कियां इस व्रत को योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए करती हैं। इस वर्ष, कोकिला व्रत 28 जुलाई 2026 को मनाया जाएगा। आइए जानते हैं इस व्रत की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इसके महत्व के बारे में...
तिथि और शुभ मुहूर्त
वैदिक पंचांग के अनुसार, आषाढ़ माह की पूर्णिमा तिथि 28 जुलाई की शाम 06:18 बजे से प्रारंभ होगी और 29 जुलाई 2026 की रात 08:05 बजे समाप्त होगी। इस प्रकार, उदयातिथि के अनुसार, कोकिला व्रत 28 जुलाई 2026 को मनाया जाएगा।
पूजा का समय
कोकिला व्रत की पूजा प्रदोष काल में करना शुभ माना जाता है। इस बार प्रदोष काल का समय शाम 07:15 से रात 09:20 बजे तक रहेगा। इस समय के दौरान सुहागिन महिलाएं पूजा-अर्चना कर सकती हैं।
पूजन विधि
इस दिन सुबह जल्दी स्नान करने के बाद भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद सूर्य देव को अर्घ्य दें और गंगाजल से मंदिर की सफाई करें। फिर मंदिर में भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा स्थापित करें। इसके बाद पवित्र मिट्टी से कोयल की छोटी प्रतिमा बनाएं, क्योंकि कोयल को माता पार्वती का प्रतीक माना जाता है।
इस कोयल की प्रतिमा को भगवान शिव और माता पार्वती की मूर्ति के पास चौकी पर रखें। फिर फूल, धूप, चंदन, दीप, बेलपत्र, भांग, धतूरा, मौसमी फल और मिठाई आदि अर्पित कर विधिपूर्वक पूजा करें।
प्रदोष काल में कोकिला व्रत की पूजा करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। पूजा के दौरान कोकिला व्रत की कथा अवश्य सुनें। अंत में माता पार्वती की आरती करें और पूजा में हुई भूलों के लिए क्षमा मांगें।