गोवर्धन पर्वत का घटता आकार: एक पौराणिक कथा
श्राप और आस्था की कहानी
गोवर्धन पर्वत का महत्व
गोवर्धन पर्वत, जिसे गिरिराज जी के नाम से भी जाना जाता है, सनातन धर्म में अत्यधिक पूजनीय है। भक्तजन इसकी परिक्रमा करते हैं, और मान्यता है कि 21 किलोमीटर की परिक्रमा से सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह विशाल पर्वत धीरे-धीरे घट रहा है?
शास्त्रों में गोवर्धन पर्वत से जुड़ी कई रोचक कहानियाँ हैं। कहा जाता है कि इसके घटते आकार का कारण एक ऋषि का श्राप है। आइए जानते हैं कि वह ऋषि कौन थे और उनकी श्राप की कहानी क्या है।
पौराणिक कथा के अनुसार
एक बार ऋषि पुलस्त्य तीर्थ यात्रा पर निकले और उन्होंने द्रोणाचल पर्वत के पास गोवर्धन पर्वत को देखा। इसकी सुंदरता ने उन्हें मंत्रमुग्ध कर दिया और उन्होंने इसे काशी ले जाने का निश्चय किया। ऋषि ने द्रोणाचल पर्वत से कहा कि वे गोवर्धन को अपने साथ ले जाना चाहते हैं।
द्रोणाचल पर्वत ने पुत्र वियोग के बावजूद ऋषि को मना नहीं किया, लेकिन गोवर्धन ने एक शर्त रखी। उसने कहा कि वह उनके साथ चलने के लिए तैयार है, लेकिन जहां भी उसे रखा जाएगा, वह वहीं स्थिर हो जाएगा। ऋषि ने अपने तपोबल के अहंकार में यह शर्त मान ली।
पर्वत को ब्रज भूमि पर नीचे रख दिया
ऋषि पुलस्त्य ने पर्वत को अपनी हथेली पर उठाकर काशी की ओर चलना शुरू किया। जब वे ब्रज मंडल पहुंचे, गोवर्धन पर्वत ने श्रीकृष्ण की लीलाओं का साक्षी बनने की इच्छा जताई। पर्वत ने अपना भार बढ़ाना शुरू कर दिया, जिससे ऋषि थक गए और उन्होंने उसे ब्रज भूमि पर रख दिया।
जब ऋषि ने पर्वत को उठाने का प्रयास किया, तो गोवर्धन ने अपनी जगह से हिलने से इनकार कर दिया। ऋषि ने क्रोधित होकर गोवर्धन को श्राप दिया कि वह हर दिन एक तिल के बराबर घटेगा और अंततः पृथ्वी में समा जाएगा।