जया पार्वती व्रत: तिथि, पूजा विधि और महत्व
जानें तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त, विधि और महत्व
जया पार्वती व्रत, नई दिल्ली: सनातन धर्म में हर व्रत का विशेष महत्व होता है। आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को जया पार्वती का व्रत मनाया जाता है। यह व्रत सुहागिन महिलाओं और कुंवारी कन्याओं दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। भगवान शिव और माता पार्वती को प्रसन्न करने के लिए यह कठिन व्रत 5 दिनों में पूरा किया जाता है।
27 जुलाई को रखा जाएगा व्रत
धार्मिक मान्यता के अनुसार, जया पार्वती का व्रत रखने से सुहागिन महिलाओं को पति की लंबी उम्र का आशीर्वाद मिलता है और वैवाहिक जीवन सुखमय रहता है। कुंवारी कन्याओं को इस व्रत से मनचाहा वर प्राप्त होता है। द्रिक पंचांग के अनुसार, इस वर्ष जया पार्वती का व्रत 27 जुलाई को मनाया जाएगा।
एक अगस्त को होगा जया पार्वती व्रत का समापन
द्रिक पंचांग के अनुसार, आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि 26 जुलाई को दोपहर 01:57 बजे शुरू होगी और 27 जुलाई को शाम 04:14 बजे समाप्त होगी। इस प्रकार, जया पार्वती का व्रत 27 जुलाई 2026 से प्रारंभ होगा और इसका समापन 01 अगस्त, शनिवार को होगा।
जया पार्वती व्रत पूजा मुहूर्त
द्रिक पंचांग के अनुसार, जया पार्वती की पूजा के लिए प्रदोष काल का शुभ मुहूर्त 27 जुलाई को शाम 07:15 बजे शुरू होगा और रात 09:20 बजे तक रहेगा।
जया पार्वती व्रत की पूजा विधि
- जया पार्वती व्रत के दिन महिलाएं सुबह जल्दी स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें।
- इसके बाद हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प करें।
- फिर एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर माता पार्वती की मूर्ति रखें।
- माता पार्वती को लाल रंग की चुनरी पहनाएं और सुहाग की सामग्री चढ़ाएं।
- फिर घी का दीपक जलाएं।
- इस दिन माता पार्वती को खीर का भोग लगाएं।
- जया पार्वती व्रत कथा पढ़ें और अंत में आरती करें।
जया पार्वती व्रत का महत्व
कहा जाता है कि जया पार्वती का व्रत कठिन होता है। यह व्रत आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी से शुरू होकर सावन माह के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि तक चलता है। पौराणिक कथा के अनुसार, देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए यही व्रत रखा था।
अविवाहित कन्याओं को योग्य वर मिलता है
अविवाहित कन्याओं को योग्य वर प्राप्त होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जया पार्वती व्रत करने से कुंडली में मौजूद ग्रह दोष समाप्त होते हैं। कहा जाता है कि महिलाओं को यह व्रत लगभग 5, 7, 9, 11 या फिर 20 साल तक करना चाहिए।