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प्रयागराज माघ मेला: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का प्रशासन से टकराव

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का संगम स्नान विवाद प्रयागराज के माघ मेले में चर्चा का विषय बन गया है। प्रशासन के साथ टकराव के कारण स्वामी ने धरना दिया। जानें उनके जीवन, शिक्षा, और सामाजिक गतिविधियों के बारे में। क्या है इस विवाद की पृष्ठभूमि? जानने के लिए पढ़ें पूरा लेख।
 

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का विवादास्पद संगम स्नान


शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती एक बार फिर चर्चा में हैं। इस बार प्रयागराज के माघ मेले में मौनी अमावस्या के दिन संगम स्नान को लेकर उनका प्रशासन के साथ टकराव हुआ। जब वे लगभग 200 शिष्यों के साथ रथ और पालकी में संगम की ओर बढ़ रहे थे, तब प्रशासन ने उन्हें भीड़ के कारण रोक दिया और पैदल स्नान करने का निर्देश दिया। इस स्थिति ने तनाव उत्पन्न कर दिया, जिसके बाद स्वामी ने संगम स्नान से इनकार करते हुए धरना दिया।


स्वामी का प्रारंभिक जीवन

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का जन्म उमाशंकर उपाध्याय के नाम से 15 अगस्त 1969 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के ब्राह्मणपुर गांव में हुआ। वे एक ब्राह्मण परिवार से हैं और बचपन से ही धार्मिक और बौद्धिक विषयों में रुचि रखते थे।


शिक्षा और धार्मिक अध्ययन

उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने गुजरात में अध्ययन किया, जहां उनका संपर्क स्वामी करपात्री जी के शिष्य ब्रह्मचारी राम चैतन्य से हुआ। उनके मार्गदर्शन में स्वामी ने संस्कृत और शास्त्रीय अध्ययन की दिशा में कदम बढ़ाया। इसके बाद वे वाराणसी पहुंचे और संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री और आचार्य की उपाधि प्राप्त की। इस दौरान वे छात्र राजनीति में भी सक्रिय रहे और 1994 में छात्रसंघ चुनाव जीतकर नेतृत्व कौशल का प्रदर्शन किया।


संन्यास और शंकराचार्य बनने की यात्रा

1990 के दशक में उन्होंने संन्यास लिया और स्वामी करपात्री की सेवा में जुट गए। इसके बाद उनका संपर्क ज्योतिर्मठ के पीठाधीश्वर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से हुआ। 15 अप्रैल 2003 को उन्हें दंड संन्यास की दीक्षा दी गई, जिसके बाद उन्हें नया नाम स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती मिला।


सामाजिक और धार्मिक गतिविधियां

स्वामी केवल धार्मिक नेता नहीं हैं, बल्कि सामाजिक मुद्दों पर भी अपनी आवाज उठाते रहे हैं। 2008 में उन्होंने गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने की मांग के लिए अनशन किया। गौहत्या, मंदिरों की आत्मनिर्भरता और धर्म में सरकारी हस्तक्षेप जैसे मुद्दों पर भी उन्होंने स्पष्ट राय रखी। पर्यावरण के प्रति सजग रहते हुए उन्होंने जोशीमठ में भूमि धंसाव पर सुप्रीम कोर्ट में PIL दायर की और जलवायु परिवर्तन पर चिंता व्यक्त की।


शंकराचार्य पद और माघ मेला विवाद

सितंबर 2022 में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य नियुक्त किया गया। हालांकि, इस पद की वैधता को लेकर विवाद और कानूनी पेच लगातार बने रहे। माघ मेले में प्रशासन ने पद की वैधता पर सवाल उठाया, जबकि स्वामी का कहना है कि शंकराचार्य का निर्णय धर्मपीठ और परंपरा तय करती है, अदालत या राजनीति नहीं।


इस प्रकार, मौनी अमावस्या पर संगम स्नान का मामला स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन के बीच टकराव का रूप ले गया, जिससे प्रयागराज में राजनीतिक-सांस्कृतिक बहस को बढ़ावा मिला।