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प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु की कथा: भगवान नरसिंह का अद्भुत रूप

इस लेख में प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु की कथा का वर्णन किया गया है, जिसमें भगवान नरसिंह का अद्भुत रूप प्रकट होता है। दैत्यराज का क्रोध और प्रह्लाद की भक्ति के बीच संघर्ष को दर्शाया गया है। जानें कैसे भगवान ने दैत्यराज का अंत किया और देवताओं को मुक्ति दिलाई। यह कथा न केवल धार्मिक है, बल्कि जीवन के गहरे अर्थों को भी उजागर करती है।
 

राजसभा का माहौल

दैत्यराज और उनके पुरोहित के साथ राजकुमार सभा में एकत्र हुए, जहां सभी का स्वागत किया गया। प्रह्लाद जी ने अपने पिता के चरणों में प्रणाम किया। दैत्यराज ने उन्हें आशीर्वाद देकर आसन पर बैठने की अनुमति दी। राजसभा भव्य थी, लेकिन दैत्यराज की उदासीनता ने माहौल को गंभीर बना दिया। सभी सभासद चुप थे, मानो भविष्य के दुख का साया सब पर छाया हुआ था।


प्रह्लाद की भक्ति

राजसभा में शांति थी, और दैत्यराज भी मौन थे। इसी बीच, दैत्य गुरुओं ने प्रह्लाद द्वारा दी जाने वाली हरिभक्ति की बातें सुनाईं। दैत्यराज का मन पहले से ही भय और शोक से भरा था। जैसे ही उसने प्रह्लाद की बातें सुनीं, उसके शरीर में आग लग गई। उसने क्रोध से प्रह्लाद को देखा और कहा, 'क्या तुम अब भी अपनी मूर्खता नहीं छोड़ोगे? मेरा अंतिम आदेश है कि तुम मुझे ही ईश्वर मानो और गोविन्द का नाम छोड़ दो।' राजपुरोहितों ने भी दैत्यराज की बातों का समर्थन किया।


प्रह्लाद का साहस

प्रह्लाद जी ने हंसते हुए कहा, 'यह आश्चर्य की बात है कि विद्वान ब्राह्मण भी भगवान की माया से मोहित होकर ऐसी बातें कर रहे हैं।' दैत्यराज के क्रोध से उसका शरीर कांपने लगा। उसने प्रह्लाद से पूछा, 'तेरा विष्णु कहां है? यदि वह सर्वव्यापी है, तो इस सभा में भी है?' प्रह्लाद ने उत्तर दिया, 'हे महाराज, जो ब्रह्मा से लेकर तिनके तक सबको अपने वश में रखते हैं, वही मेरे बल हैं।'


दैत्यराज का क्रोध

प्रह्लाद के उत्तर से दैत्यराज और भी क्रोधित हो गया। उसने कहा, 'क्या वह इस खम्भे में भी है? यदि है, तो दिखा!' प्रह्लाद ने कहा, 'पिताजी, आप शांत रहें, मैं सच कह रहा हूं।' दैत्यराज ने खम्भे पर प्रहार किया, जिससे राजसभा में भूकंप आ गया। तभी भगवान श्रीहरि खम्भे से प्रकट हुए। दैत्यराज ने भगवान नरसिंह का अद्भुत रूप देखा और भय से उसकी आंखें मूंद गईं।


भगवान नरसिंह का प्रकट होना

भगवान नरसिंह ने दैत्यराज को उठाकर अपनी जंघा पर रखा और उसे नष्ट कर दिया। दैत्यराज का अंत हो गया, और उसके साथी भी भगवान की कोपज्वाला में भस्म हो गए। हिरण्यकशिपु के वध की खबर फैलते ही देवताओं को मुक्त कर दिया गया, जिससे संसार में आनंद का माहौल बन गया।