भगवान शनि की पूजा: जानें विधि और सामग्री
भगवान शनि की पूजा का महत्व
नई दिल्ली: भगवान शनि की पूजा को अत्यधिक शुभ माना जाता है। उन्हें न्याय और कर्म का स्वामी माना जाता है, और यह विश्वास है कि वे लोगों को उनके कर्मों के अनुसार फल प्रदान करते हैं। शनि की पूजा विशेष रूप से शनिवार के दिन की जाती है। इस दिन जो भक्त उनकी पूजा करते हैं और व्रत रखते हैं, उन्हें 'कर्म-फलों के दाता' का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
भगवान शनि की पूजा कैसे करें
शनि देव, जो न्याय के देवता हैं, मनुष्यों को उनके कर्मों के अनुसार फल देते हैं। वैदिक ज्योतिष में शनि की महादशा को एक महत्वपूर्ण चरण माना जाता है, जो 19 वर्षों तक चलती है। यह व्यक्ति के पिछले कर्मों और जन्म कुंडली में शनि की स्थिति पर निर्भर करती है। यदि कुंडली में शनि की स्थिति प्रतिकूल हो, तो यह व्यक्ति को कठिनाइयों में डाल सकती है। वहीं, शनि की कृपा से कोई भी व्यक्ति समृद्ध हो सकता है। इसलिए, यदि आप शनि की दशा से परेशान हैं, तो नीचे दी गई विधि से उनकी पूजा करके शुभ परिणाम प्राप्त कर सकते हैं।
शनि देव की पूजा के लिए आवश्यक सामग्री
शनि देव की पूजा के लिए आवश्यक सामग्री एकत्रित करें। पूजा के लिए एक काले रंग का सिंहासन, जो आम की लकड़ी या लोहे का बना हो, आवश्यक है। यजमान के लिए काले वस्त्र और एक काला तौलिया भी जरूरी हैं। पूजा में काले फूल, काले तिल, काले चने, सरसों का तेल, दीपक, और सूती बत्तियों का उपयोग किया जाएगा। भोग में काले तिल के लड्डू, अरबी, शहद, चीनी, दही, गाय का दूध, लौंग, इलायची और सूखे मेवे चढ़ाए जाने चाहिए। इसके अलावा, एक पंचपात्र, काला कंबल, और हवन सामग्री की आवश्यकता होगी।
शनि देव पूजा विधि
अपने दाहिने हाथ की उंगलियों में थोड़ा पानी लेकर इसे अपने शरीर पर छिड़कें और खुद को शुद्ध करें। फिर दीपक जलाएं और इसे शनि देव की मूर्ति या तस्वीर के सामने रखें। भगवान शनि के दिव्य रूप का ध्यान करते हुए, मूर्ति के समक्ष फूल, चंदन का लेप, बेलपत्र और अन्य पवित्र वस्तुएं चढ़ाएं।
इसके बाद कुशा का पवित्र धागा धारण करें और माथे पर चंदन का तिलक लगाएं। तिलक लगाते समय इस मंत्र का जाप करें: 'ॐ चंदनस्य पुण्यं पवित्र पाप नाशनम्। आपदां हरते नित्यं शनिदेव: रीतिस्थ सर्वदा।'
तिलक के बाद शनिदेव का आह्वान
मंगलाचरण मंत्र का जाप करें: 'अष्टम्या रेवती संविताय सौराष्ट्र जाति कश्यप गोत्र लौहवर्ण धनुराकृतिम मंडलात्पश्चिमशाष्ठाम् पश्चिमोन्मुखी गृधवाहन संकर जाति यमाधि दैवतं प्रजापति प्रत्यधि देवतां शनिमवहयम्।'
इसके बाद विनियोग मंत्र का जाप करें: 'ॐ शन्नों देवी रीति मंत्रस्य दध्यंदथर्वण ऋषि: गायत्री छंद: शनिर्देवता आपो बीजं प्रस्तुत इति शक्ति: शनैश्चर प्रीत्यर्थे जपे विनियोगा।'
ऋष्यादिन्यास
विनियोग के बाद इस विधि से ऋष्यादिन्यास करें: 'ॐ दध्यन्दथर्वं ऋषये नमः।' - शिरसि (सिर पर स्पर्श करें) 'ॐ गायत्री चन्द्रसे नमः।' - मुखे (मुँह का स्पर्श करें) 'ॐ शनैश्चर देवतायै नमः।' - हृदय (हृदय को स्पर्श करें) 'ॐ अपोबिजाय नमः।' - गहरा (गहरे भाग का स्पर्श करें) 'ॐ प्रक्रांत शक्तायै नमः।' - पदयोः (दोनों चरण स्पर्श करें)