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भारत और अमेरिका का चीन के खनिज एकाधिकार के खिलाफ सहयोग

भारत और अमेरिका ने चीन के खनिज एकाधिकार को चुनौती देने के लिए एक नई पहल की है। दोनों देशों ने 'पैक्स सिलिका' नामक संगठन में शामिल होने का प्रस्ताव रखा है, जिससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत किया जा सके। इस दिशा में एक उच्च स्तरीय बैठक का आयोजन किया गया, जिसमें कई देशों के वित्त मंत्रियों ने भाग लिया। बैठक में क्रिटिकल मिनरल्स के खनन और प्रसंस्करण में सहयोग पर जोर दिया गया। जानें इस महत्वपूर्ण सहयोग के पीछे की रणनीति और इसके संभावित प्रभावों के बारे में।
 

भारत और अमेरिका की नई पहल

नई दिल्ली: भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक मतभेदों के बावजूद, दोनों देश 'क्रिटिकल मिनरल्स' (दुर्लभ खनिज) के क्षेत्र में एकजुटता दिखा रहे हैं। इन खनिजों की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को चीन के प्रभाव से मुक्त करने के लिए, दोनों देशों ने एक साथ काम करने का निर्णय लिया है। इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, अमेरिका के नए राजदूत सर्जियो गोर ने भारत को 'पैक्स सिलिका' नामक नए संगठन का सदस्य बनने का प्रस्ताव दिया है।


उच्च स्तरीय बैठक का आयोजन

इस प्रस्ताव के तुरंत बाद, वाशिंगटन में एक उच्च स्तरीय बैठक का आयोजन किया गया, जिसमें अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने भाग लिया। इस बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व रेलवे और आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने किया। इसे वैश्विक स्तर पर क्रिटिकल मिनरल्स के खनन और प्रसंस्करण में चीन के बढ़ते प्रभाव को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक प्रयास माना जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य सेमीकंडक्टर, सौर ऊर्जा और अन्य उच्च तकनीक वाले विनिर्माण क्षेत्रों के लिए दुर्लभ धातुओं की सुरक्षित आपूर्ति सुनिश्चित करना है।


सहयोग और अनुसंधान पर जोर

बैठक में भारत के अलावा जापान, इजरायल, कनाडा, ब्रिटेन, इटली, दक्षिण कोरिया, मैक्सिको और फ्रांस के वित्त मंत्रियों ने भी भाग लिया। चर्चा के दौरान यह सहमति बनी कि सभी देश आपस में शोध और अनुसंधान साझा करेंगे, जिससे क्रिटिकल मिनरल्स की खोज, निष्कर्षण और प्रसंस्करण में तकनीक का आदान-प्रदान आसान होगा। अमेरिकी सरकार ने इस बैठक को वैश्विक अर्थव्यवस्था की स्थिरता के लिए आवश्यक बताया और सभी प्रतिभागियों ने आपूर्ति श्रृंखलाओं की कमजोरियों को दूर करने पर जोर दिया।


भारत की आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम

अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी बेसेंट ने सभी देशों से जोखिम कम करने की नीति अपनाने की उम्मीद जताई। उन्होंने संकेत दिया कि दुर्लभ खनिजों के 60 से 90 प्रतिशत वैश्विक भंडार पर एक ही देश का नियंत्रण है, जिससे आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान की संभावना बढ़ गई है। भारतीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि सुरक्षित क्रिटिकल मिनरल सप्लाई चेन 'विकसित भारत' के लक्ष्य के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि भारत इन खनिजों की घरेलू खोज को बढ़ावा दे रहा है और वैश्विक साझेदारी के माध्यम से आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध है।


दुर्लभ धातुओं की पहचान

आंकड़ों के अनुसार, अमेरिकी सरकार ने 60 और भारत सरकार ने 35 दुर्लभ धातुओं को चिन्हित किया है, जिनमें लिथियम, कोबाल्ट, निकल, ग्रेफाइट, रेअर अर्थ एलिमेंट्स, सिलिकॉन, कॉपर, बेरेलियम, जर्मेनियम और बिस्मथ शामिल हैं। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) की 'ग्लोबल क्रिटिकल मिनरल्स आउटलुक 2025' रिपोर्ट के अनुसार, चीन 20 में से 19 प्रमुख खनिजों की रिफाइनिंग में अग्रणी है और उसकी बाजार में औसत हिस्सेदारी लगभग 70 प्रतिशत है। विशेष रूप से सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक वाहन और सौर ऊर्जा पैनल के लिए आवश्यक रेअर अर्थ एलिमेंट्स के खनन और रिफाइनिंग पर चीन का 70 से 90 प्रतिशत तक नियंत्रण है।