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रवि प्रदोष व्रत: पूजा विधि और लाभ

रवि प्रदोष व्रत भगवान शिव की पूजा का एक महत्वपूर्ण अवसर है, जो विशेष रूप से रविवार को मनाया जाता है। इस दिन भक्तों को सुख, समृद्धि और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। जानें इस व्रत की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और मंत्र, जो आपको इस विशेष दिन की तैयारी में मदद करेंगे।
 

रवि प्रदोष व्रत का महत्व

हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत का आयोजन भगवान शिव की आराधना के लिए किया जाता है। इसे भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का सबसे शुभ अवसर माना जाता है। जब यह व्रत रविवार को आता है, तो इसे रवि प्रदोष व्रत कहा जाता है। इस दिन व्रत करने से भक्त को भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद मिलता है। आइए जानते हैं रवि प्रदोष व्रत की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और मंत्र के बारे में...


शुभ मुहूर्त

हिंदू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि 28 फरवरी की रात 08:43 बजे से शुरू होगी। यह तिथि 01 मार्च 2026 को समाप्त होगी। इस दिन प्रदोष काल में पूजा का आयोजन किया जाता है, इसलिए 01 मार्च 2026 को रवि प्रदोष व्रत मनाया जाएगा।


पूजन विधि

इस दिन प्रातः जल्दी स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें और सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करें। फिर मंदिर के सामने बैठकर व्रत का संकल्प लें और सूर्यास्त के बाद पुनः स्नान करें। इसके बाद भगवान शिव का दूध और गंगाजल से अभिषेक करें। शिवलिंग पर धतूरा, बेल पत्र, सफेद फूल, अक्षत और चंदन अर्पित करें। इसके बाद माता पार्वती को श्रृंगार का सामान अर्पित करें और विधिपूर्वक पूजा करें। अंत में दीपक जलाकर प्रदोष व्रत की कथा का पाठ करें और शिव-पार्वती की आरती करें। पूजा में हुई भूलों के लिए क्षमा मांगें।


पूजन मंत्र

ॐ नमः शिवाय॥


ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय नमः॥


ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।


उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥


व्रत के लाभ

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को करने से भक्त को सुख, समृद्धि और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। यह व्रत कुंडली में सूर्य की स्थिति को मजबूत करता है, जिससे व्यक्ति का समाज में मान-सम्मान बढ़ता है और जीवन में शुभता का आगमन होता है।