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सावन सोम प्रदोष: धार्मिक महत्व और व्रत के लाभ

सावन सोम प्रदोष व्रत का धार्मिक और पौराणिक महत्व अत्यधिक है। यह व्रत 10 अगस्त 2026 को मनाया जाएगा, जब त्रयोदशी तिथि सोमवार को आएगी। इस व्रत के कई लाभ हैं, जैसे चंद्र दोष का निवारण, स्वास्थ्य में सुधार, और पापों से मुक्ति। जानें इस व्रत की पूजा का शुभ मुहूर्त और इसके पीछे की मान्यताएँ।
 

सावन सोम प्रदोष का महत्व

सावन सोम प्रदोष: भक्ति, शक्ति और आस्था के पवित्र सावन महीने में आने वाला सोम प्रदोष व्रत का धार्मिक और पौराणिक महत्व अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब त्रयोदशी तिथि सोमवार को आती है, तब इसे सोम प्रदोष कहा जाता है। वैदिक पंचांग के अनुसार, सावन माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 10 अगस्त 2026 को शुरू होगी।


पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्रदोष काल में भगवान शिव कैलाश पर्वत के रजत भवन में प्रसन्न मुद्रा में तांडव नृत्य करते हैं। सभी देवता और माता पार्वती उस समय शिवजी की महिमा का गुणगान करते हैं। इस पावन समय में शिव की आराधना करने से भक्त के हृदय में महादेव का वास होता है। प्रदोष व्रत महादेव की कृपा प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है, इसलिए इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।


व्रत के लाभ

चंद्र दोष निवारण:
सोमवार के दिन होने के कारण यह व्रत कुंडली में चंद्रमा की स्थिति को मजबूत करता है और चंद्र दोष को शांत करता है।


सुख और स्वास्थ्य:
इस व्रत को रखने से आयु में वृद्धि होती है, स्वास्थ्य में सुधार होता है और रोग-शोक दूर होते हैं।


सुयोग्य जीवनसाथी और संतान:
मान्यता है कि इस व्रत के पालन से वैवाहिक जीवन सुखमय होता है, इच्छित वर की प्राप्ति होती है और योग्य संतान की प्राप्ति होती है।


पापों से मुक्ति:
जीवनभर के संचित कर्मों और पापों का नाश होता है और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।


शुभ मुहूर्त

प्रदोष व्रत की पूजा:
प्रदोष व्रत की पूजा हमेशा संध्या काल में, अर्थात प्रदोष काल में की जाती है। इस वर्ष 10 अगस्त 2026 को शाम 07:05 बजे से रात 09:14 बजे तक पूजा का सबसे शुभ और फलदायी मुहूर्त रहेगा।