12 साल बाद बिछड़े परिवार का पुनर्मिलन: मां को देखकर भावुक हुए बेटे
यमुनानगर में मानवता की मिसाल
यमुनानगर- मानव सेवा के क्षेत्र में कार्यरत मगरपुर स्थित "नी आसरे दा आसरा" आश्रम ने एक बार फिर से मानवता की एक अद्भुत मिसाल पेश की है। 2014 में अपने परिवार से बिछड़ी एक महिला को 12 साल बाद उसके परिजनों से मिलवाया गया। मां को देखकर परिवार की आंखों में खुशी के आंसू थे, जबकि बेटा उसे गले लगाकर अपने भावनाओं को नहीं रोक सका।
महिला की पहचान की खोज
जानकारी के अनुसार, अंबाला के साहा थाना क्षेत्र में एक महिला लावारिस अवस्था में मिली थी। पुलिस ने उसे 4 मई 2026 को "नी आसरे दा आसरा" आश्रम में भेजा। महिला मानसिक रूप से अस्वस्थ थी और अपनी पहचान स्पष्ट नहीं कर पा रही थी। आश्रम में उसका उपचार किया गया और उसकी देखभाल की गई, जिससे उसकी स्थिति में सुधार हुआ।
काउंसलिंग से मिली पहचान
आश्रम की टीम ने महिला की लगातार काउंसलिंग की और उसकी पहचान खोजने का प्रयास किया। शुरुआत में उसने केवल अपना नाम "राजो देवी" बताया। काफी प्रयासों के बाद उसने उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले का जिक्र किया। इसके बाद टीम ने बिजनौर के विभिन्न गांवों के नाम लिए, जिसमें उसने शेरकोट गांव की पहचान की।
परिवार से मिलन का भावुक क्षण
आश्रम प्रबंधन ने गांव के सरपंच से संपर्क किया, जिसके बाद महिला के परिवार का पता लगाया गया। वीडियो कॉल के माध्यम से जब परिजनों को महिला दिखाई गई, तो वे भावुक हो गए। परिवार को विश्वास नहीं हो रहा था कि जिसे उन्होंने वर्षों पहले खो दिया था, वह अब जीवित उनके सामने है।
बेटों की खुशी
कुछ ही दिनों में महिला के बेटे सोनू कुमार, रोहित कुमार और कपिल कुमार अपने अन्य परिजनों के साथ आश्रम पहुंचे। जैसे ही राजो देवी ने अपने बेटों को देखा, वह उन्हें पहचान गई और गले लगाकर फूट-फूटकर रोने लगी। वर्षों बाद मां और बेटों का यह मिलन वहां मौजूद लोगों की आंखों को भी नम कर गया।
परिवार की खोज
बेटों ने बताया कि 2014 में पिता रामदास के साथ कहासुनी के बाद उनकी मां घर छोड़कर चली गई थीं। परिवार ने उनकी काफी तलाश की, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला। उस समय क्षेत्र में आई बाढ़ के कारण परिवार ने मान लिया था कि उनकी मृत्यु हो चुकी है।
आश्रम का उद्देश्य
आश्रम के संचालक जसकीरत सिंह ने बताया कि आवश्यक पहचान और सत्यापन प्रक्रिया पूरी करने के बाद महिला को उसके परिजनों के सुपुर्द कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि आश्रम में वर्तमान में 250 से अधिक निराश्रित और मानसिक रूप से अस्वस्थ लोगों की देखभाल की जा रही है।
उम्मीद की जीत
12 वर्षों बाद मां और बेटों के इस भावुक मिलन ने एक बार फिर साबित कर दिया कि उम्मीद और मानवता की डोर कभी नहीं टूटती।