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आर्थिक तनाव: दिमाग पर पड़ने वाले प्रभाव और उम्र बढ़ने की प्रक्रिया

एक नए अध्ययन में यह सामने आया है कि लंबे समय तक आर्थिक तनाव मस्तिष्क के आकार को सिकुड़ने और सोचने-समझने की क्षमता को प्रभावित करता है। यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के शोध में पाया गया कि आर्थिक तंगी का सामना करने वाले व्यक्तियों में मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। अध्ययन में शामिल 2,759 लोगों के डेटा से यह स्पष्ट हुआ है कि आर्थिक कठिनाइयों का सामना करने वाले लोग मानसिक और कॉग्निटिव टेस्ट में पिछड़ जाते हैं। इस लेख में जानें कि कैसे आर्थिक तनाव डिमेंशिया जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ा सकता है।
 

सोचने की क्षमता पर बुरा असर


दिमाग का आकार सिकुड़ने की समस्या
यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन द्वारा किए गए एक अध्ययन में यह सामने आया है कि लंबे समय तक आर्थिक कठिनाई और गरीबी का सामना करने से मस्तिष्क की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया तेज हो जाती है। इस वित्तीय तनाव के चलते दिमाग का आकार सिकुड़ने लगता है, जिससे सोचने-समझने की क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।


सर्वेक्षण के निष्कर्ष

इस अध्ययन में 2,759 व्यक्तियों पर सर्वेक्षण किया गया। परिणामों से पता चला कि 53 वर्ष की आयु तक, जिन लोगों ने आर्थिक तंगी का सामना किया, उनकी सोचने-समझने की क्षमता उन लोगों की तुलना में कम थी, जिन्होंने ऐसी समस्याओं का सामना नहीं किया। रिसर्चर जैक्स वेल्स ने कहा कि लंबे समय तक आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना खराब मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा है।


शब्दों की याददाश्त में कमी

अध्ययन में यह भी पाया गया कि 53 से 69 वर्ष की आयु के बीच इन व्यक्तियों में शब्दों को याद रखने की क्षमता में गिरावट आई है, जो यह दर्शाता है कि उनकी सोचने-समझने की क्षमता पहले ही प्रभावित हो चुकी थी।


डिमेंशिया का खतरा

अध्ययन में यह भी बताया गया है कि यदि आर्थिक तंगी को लंबे समय तक चलने वाली समस्या बनने से रोका जाए, तो उम्र बढ़ने से संबंधित सोचने-समझने की क्षमता में कमी और डिमेंशिया जैसी बीमारियों से बचा जा सकता है।


डिमेंशिया की वैश्विक स्थिति

डिमेंशिया एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है, जो 2019 में 57 मिलियन लोगों को प्रभावित कर चुकी थी। अनुमान है कि 2050 तक इसके मामलों की संख्या तीन गुना बढ़कर 150 मिलियन से अधिक हो जाएगी।