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उत्तराखंड का अनोखा कार्तिक स्वामी मंदिर: जहां अस्थियों की होती है पूजा

उत्तराखंड का कार्तिक स्वामी मंदिर एक अनोखा धार्मिक स्थल है, जहां अस्थियों की पूजा की जाती है। यह मंदिर त्याग और समर्पण का प्रतीक है, और इसकी पौराणिक कहानियां भक्तों को आकर्षित करती हैं। रुद्रप्रयाग जिले में स्थित, यह मंदिर कठिन ट्रेकिंग के बाद पहुंचा जा सकता है। यहां की शाम की आरती और प्राकृतिक सुंदरता इसे विशेष बनाती है। जानें इस अद्भुत मंदिर के बारे में और भी जानकारी।
 

कार्तिक स्वामी मंदिर का अनूठा इतिहास

नई दिल्ली: भारत के हर मंदिर में या तो स्वयंभू प्रतिमा की पूजा होती है या स्थापित प्रतिमा की। कुछ प्राचीन मंदिरों में पेड़ के नीचे स्थित शिलाओं का भी पूजन किया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि उत्तराखंड की देवभूमि में एक ऐसा मंदिर है, जहां अस्थियों की पूजा की जाती है?


यह सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन यह सच है। हम बात कर रहे हैं कार्तिक स्वामी मंदिर की, जो त्याग, प्रेम और समर्पण का प्रतीक है।


कार्तिक स्वामी मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में रुद्रप्रयाग-पोखरी मार्ग पर कनकचौरी गांव के निकट स्थित है। कनकचौरी गांव से लगभग 3 किलोमीटर की आसान पैदल यात्रा आपको इस मंदिर की खूबसूरती तक पहुंचाती है। चूंकि यह पहाड़ी की चोटी पर है, भक्तों को ट्रेकिंग के माध्यम से मंदिर तक पहुंचना होता है। यात्रा के दौरान पहाड़ों से उत्तराखंड का दृश्य स्वर्ग के समान लगता है।


इस मंदिर में सावन और शिवरात्रि के समय विशेष अनुष्ठान और पूजा का आयोजन होता है, लेकिन दुर्गम रास्तों के कारण यहां श्रद्धालुओं की संख्या में उतार-चढ़ाव होता रहता है।


कार्तिक स्वामी मंदिर से जुड़ी कई पौराणिक कहानियां प्रचलित हैं। कहा जाता है कि कार्तिकेय, जो दक्षिण की धरती पर राज करते थे, भगवान गणेश के साथ प्रतिस्पर्धा के बाद पहाड़ियों पर चले आए और अपने माता-पिता भगवान शिव और माता पार्वती को प्रेम, त्याग और समर्पण का प्रमाण देते हुए अपना शरीर त्याग दिया। इसी कारण मंदिर में किसी प्रतिमा की जगह प्राकृतिक रूप से बनी शिला को भगवान कार्तिकेय की अस्थियों के रूप में पूजा जाता है।


इस मंदिर का इतिहास लगभग 200 साल पुराना है। हालांकि यह मंदिर छोटा है, लेकिन भक्तों की आस्था इसे दुर्गम रास्तों को पार करने के लिए प्रेरित करती है। मंदिर की एक विशेषता शाम की आरती है, जब कई घंटियां एक साथ बजती हैं और उनकी ध्वनि से पूरा पहाड़ शिवमय हो जाता है। बर्फबारी के मौसम में थोड़ी सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है, लेकिन मंदिर साल भर खुला रहता है।