कबीरदास: भोजपुरी में निर्गुण भक्ति का अद्वितीय स्वर
कबीरदास की भाषा और उनके भजन
कबीरदास की प्रमुख भाषा साधुक्कड़ी थी, जिसमें भोजपुरी, अवधी, ब्रज और राजस्थानी के शब्दों का समावेश है। उनके भजनों और साखियों में भोजपुरी की गहरी छाप देखने को मिलती है। भोजपुरी क्षेत्र में कबीर की निर्गुण विचारधारा को फैलाने का यह एक महत्वपूर्ण माध्यम है। उनके प्रसिद्ध भजन जैसे 'तोरी गठरी में लागे चोर' और 'कवने ठगवा नगरिया लूटल हो' भोजपुरी लोक संगीत की अमूल्य धरोहर हैं।
कबीरदास जयंती 29 जून को मनाई जाती है। उन्होंने अपनी भाषा के बारे में लिखा था, 'मेरी बोली पूरबी, हमें लख नहीं कोय, हमको तो सोही लखै जो धुर पूरब का होय'। यहाँ 'पूरबी' से तात्पर्य पूर्वी उत्तर प्रदेश की बोलियों, विशेषकर भोजपुरी से है।
संत कबीरदास भक्तिकाल के निर्गुण शाखा के महानतम कवि माने जाते हैं। उनकी विचारधारा और लोक साहित्य का गहरा संबंध भोजपुरी भाषा से है। कबीर ने निराकार ब्रह्म की उपासना की, जिसे वे 'राम', 'साहेब' या 'अलख' के नाम से पुकारते थे। उनके अनुसार, ईश्वर हर मनुष्य के भीतर विद्यमान है। उन्होंने जात-पात, कर्मकांड, अंधविश्वास और पाखंड का कड़ा विरोध किया।
कबीर की रचनाओं में आत्मा और परमात्मा के मिलन के विषय प्रमुख हैं, जो भोजपुरी निर्गुण लोकगीतों में गाए जाते हैं। उनके भजन जैसे 'हंस अकेले चली जाए, भंवरवा के तोहरा संग जाई' मृत्यु की सच्चाई और आत्मा की यात्रा का वर्णन करते हैं।
भोजपुरी क्षेत्र में कबीर की वाणी आज भी उतनी ही लोकप्रिय है, जितनी सदियों पहले थी। गांवों में सत्संग, भजन कीर्तन और निर्गुण गायन में कबीर के पद प्रमुखता से गाए जाते हैं।
कबीर की विचारधारा ने भोजपुरी साहित्य में निर्गुण भक्ति धारा का विकास किया। कई लोककवियों और गायकों ने कबीर के संदेश को अपनाया है। उनके साहित्य में ईश्वर की निराकार सत्ता, मानव समानता और सामाजिक समरसता जैसे विषय प्रमुख हैं।
कबीर ने जात-पात और धार्मिक कट्टरता का विरोध किया, जो भोजपुरी लोकगीतों में भी देखने को मिलता है। आज भी कबीर के दोहे और पद जीवन दर्शन का आधार माने जाते हैं।