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कर्मयोग: स्वामी मुक्तिनाथानंद का संदेश

स्वामी मुक्तिनाथानंद ने लखनऊ में कर्मयोग के महत्व पर चर्चा की, जिसमें उन्होंने बताया कि कर्म केवल जीवन यापन का साधन नहीं, बल्कि आत्मिक विकास और समाज के कल्याण का माध्यम है। उन्होंने कर्मयोग के सिद्धांतों को समझाते हुए बताया कि सच्चा योग वही है, जो श्रद्धा और अनासक्ति के साथ किया जाए। उनका संदेश यह है कि कर्म का उद्देश्य व्यक्तिगत उन्नति नहीं, बल्कि समाज की सेवा होना चाहिए।
 

कर्मयोग का महत्व


लखनऊ। रामकृष्ण मठ लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने गुरुवार को एक प्रातःकालीन सत्संग में भारतीय दर्शन में कर्मयोग के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कर्म को केवल जीवन यापन का साधन नहीं, बल्कि आत्मिक विकास और समाज के कल्याण का माध्यम बताया है।


स्वामी जी ने बताया कि कर्मयोग का मुख्य संदेश यह है कि मनुष्य को अपने कर्तव्यों का पालन कुशलता, श्रद्धा और अनासक्ति के साथ करना चाहिए। श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया है— “योगः कर्मसु कौशलम्” अर्थात कर्मों को कुशलता से करना ही योग है। इसका अर्थ केवल बाहरी दक्षता नहीं, बल्कि मन, बुद्धि और भावना की एकाग्रता के साथ कार्य करना है। जब व्यक्ति अपने कार्य को ईमानदारी और समर्पण से करता है, तब उसका कर्म साधना बन जाता है।


स्वामी जी ने कर्मयोग के एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू पर भी चर्चा की— आसक्ति और अनासक्ति। सामान्य व्यक्ति अपने कार्यों को फल की इच्छा के साथ करता है, जबकि ज्ञानी व्यक्ति कर्म में लगे रहते हुए भी भीतर से अनासक्त रहते हैं। वे कर्म करते हैं, लेकिन उसके परिणाम की चिंता नहीं करते। यह निष्काम कर्म की भावना है, जो मानसिक शांति प्रदान करती है और अहंकार तथा निराशा से दूर रखती है।


मां सारदा देवी का जीवन कर्मयोग का एक बेहतरीन उदाहरण है। उन्होंने अपने दैनिक कार्यों को प्रेम और पूर्णता के साथ किया। चाहे वह आसन बिछाना हो या अतिथि की सेवा, उन्होंने हर कार्य में समर्पण और अनुशासन का पालन किया। उनके जीवन से यह सीख मिलती है कि कोई भी कार्य छोटा नहीं होता, यदि उसे श्रद्धा और निष्ठा से किया जाए।


स्वामी जी ने यह भी बताया कि कर्मयोग का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत उन्नति नहीं है। ज्ञानी व्यक्ति समाज और दूसरों के कल्याण के लिए कर्म करते हैं। उनका जीवन यह संदेश देता है कि सच्चा कर्म वही है, जो स्वार्थ से ऊपर उठकर लोकमंगल की भावना से किया जाए। जब मनुष्य अपने कर्मों को समाज की सेवा से जोड़ता है, तब उसका जीवन अधिक सार्थक बन जाता है।


अंत में, स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने कहा कि कर्मयोग हमें यह सिखाता है कि जीवन के प्रत्येक कार्य को श्रद्धा, कुशलता और अनासक्ति के साथ करना चाहिए। यदि मनुष्य अपने कर्तव्यों का पालन बिना फल की इच्छा के करे, तो वही सच्चा योग है। ऐसा कर्म न केवल व्यक्ति को आंतरिक शांति देता है, बल्कि समाज में भी सकारात्मक परिवर्तन लाने का माध्यम बनता है।