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चंद्र ग्रहण: राहु की चंद्रमा को निगलने की कोशिश का रहस्य

03 मार्च को होने वाला चंद्र ग्रहण भारत में दिखाई देगा, जिसका सूतक काल भी मान्य होगा। इस लेख में हम जानेंगे कि राहु चंद्रमा को निगलने की कोशिश क्यों करता है, और इसके पीछे की धार्मिक और ज्योतिषीय कथा क्या है। स्कंद पुराण में वर्णित इस कथा के माध्यम से हम समझेंगे कि कैसे देवताओं और असुरों के बीच अमृत के लिए विवाद ने राहु को चंद्रमा का पीछा करने पर मजबूर किया।
 

03 मार्च को होगा चंद्र ग्रहण


पूर्णिमा के दिन 03 मार्च को लगेगा चंद्र ग्रहण
इस वर्ष फाल्गुन माह की पूर्णिमा पर 03 मार्च को चंद्र ग्रहण होगा, जो भारत में दिखाई देगा। इस कारण इसका सूतक काल भी मान्य होगा। खगोल विज्ञान के अनुसार, जब पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच आ जाती है, तब चंद्र ग्रहण होता है।


चंद्र ग्रहण का धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व

चंद्र ग्रहण की घटना को धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। इसे राहु और केतु के कारण होने वाली घटना के रूप में देखा जाता है। इस विषय पर स्कंद पुराण में एक कथा वर्णित है। आइए जानते हैं कि राहु चंद्रमा को निगलने की कोशिश क्यों करता है।


स्कंद पुराण की कथा

स्कंद पुराण के अनुसार, देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन किया, जिससे अमृत निकला। जब अमृत निकला, तो देवताओं और असुरों के बीच इसे पीने को लेकर विवाद हुआ। भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर इस विवाद को सुलझाया और अमृत देवताओं को पिलाने लगे। लेकिन स्वरभानु नामक असुर ने देवताओं का रूप धारण कर अमृत पी लिया।


राहु की चंद्रमा को निगलने की कोशिश

सूर्य और चंद्रमा ने भगवान विष्णु को इस धोखे के बारे में बताया, जिससे विष्णु ने स्वरभानु का सिर काट दिया। हालांकि, स्वरभानु ने अमृत पी लिया था, इसलिए उसकी मृत्यु नहीं हुई। स्वरभानु का सिर राहु कहलाता है और धड़ केतु। इस कथा के अनुसार, राहु समय-समय पर सूर्य और चंद्रमा को निगलने की कोशिश करता है, जिससे चंद्र ग्रहण होता है।