×

पंजाब में हास्य-व्यंग्य साहित्य की समृद्ध परंपरा पर विशेष व्याख्यान

गुरु नानक देव विश्वविद्यालय में आयोजित एक विशेष व्याख्यान में पंजाब के हास्य-व्यंग्य साहित्य की समृद्ध परंपरा पर चर्चा की गई। प्रमुख साहित्यकार प्रेम विज ने इस क्षेत्र में अपने योगदान और चुनौतियों के बारे में विचार साझा किए। कार्यक्रम में डॉ जी एस बाजवा और अन्य साहित्यकारों ने भी अपने विचार प्रस्तुत किए। जानें इस समृद्ध परंपरा के बारे में और कैसे यह समाज की विसंगतियों पर प्रकाश डालता है।
 

विशेष व्याख्यान का आयोजन

अमृतसर/चंडीगढ़ - गुरु नानक देव विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग ने हिंदी पखवाड़े के अंतर्गत ‘पंजाब का हास्य-व्यंग्य साहित्य: विसंगतियों के विरुद्ध रचनात्मक प्रतिरोध’ विषय पर एक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में डॉ जी एस बाजवा विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।


प्रमुख साहित्यकार का योगदान

कार्यक्रम की शुरुआत में विभागाध्यक्ष प्रो. सुनील कुमार ने बताया कि साहित्यकार प्रेम विज का हास्य-व्यंग्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने 26 पुस्तकों के माध्यम से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है, जिनमें से दो पुस्तकें हास्य-व्यंग्य पर आधारित हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यह साहित्यिक विधा चुनौतीपूर्ण है, लेकिन पंजाब ने इसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।


हास्य-व्यंग्य की परंपरा

प्रेम विज ने पंजाब में हास्य-व्यंग्य की प्राचीन परंपरा पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि राजाओं के दरबारों में विदूषकों की उपस्थिति इसका प्रमाण है। लोकगीतों, कहावतों और परंपराओं में हास्य-व्यंग्य के विभिन्न रूप सहजता से मिलते हैं।


हास्य और व्यंग्य का महत्व

उन्होंने कहा कि हास्य और व्यंग्य दोनों जीवन की विसंगतियों और सामाजिक परिस्थितियों से जुड़े हैं, लेकिन उनके उद्देश्य में अंतर है। हास्य मुस्कान लाता है, जबकि व्यंग्य आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है। श्रेष्ठ व्यंग्य केवल हंसाने का कार्य नहीं करता, बल्कि समाज की विसंगतियों पर प्रश्न भी उठाता है।


प्रमुख साहित्यकारों का उल्लेख

प्रेम विज ने पंजाब के हास्य-व्यंग्य साहित्य को समृद्ध करने वाले प्रमुख साहित्यकारों का उल्लेख किया, जिनमें डॉ. संसार चंद्र, डॉ. इंद्रनाथ मदान, और सुरेश सेठ शामिल हैं। उन्होंने कहा कि इनकी रचनाओं में हास्य केवल हंसी का माध्यम नहीं है, बल्कि सामाजिक चेतना और सुधार की भावना भी दिखाई देती है।


वर्तमान चुनौतियाँ

उन्होंने वर्तमान हास्य-व्यंग्य लेखन की चुनौतियों पर भी प्रकाश डाला। व्यंग्यकार के लिए आवश्यक है कि वह कटुता और व्यक्तिगत आक्षेप से बचे, विषय का उचित चुनाव करे, और भाषा की गरिमा बनाए रखे।


सम्मान और समापन

इस अवसर पर जालंधर से आई प्रसिद्ध लेखिका डॉ. सरला भारद्वाज ने भी अपने विचार साझा किए। कार्यक्रम का संचालन शोधार्थी मुकेश कुमार ने किया। अंत में, विभागाध्यक्ष प्रो. सुनील कुमार ने प्रेम विज को अंगवस्त्र और प्रशस्ति-पत्र देकर सम्मानित किया।