पुत्रदा एकादशी: संतान सुख की प्राप्ति के लिए विशेष व्रत
पुत्रदा एकादशी, जो भगवान विष्णु को समर्पित है, संतान सुख की प्राप्ति के लिए महत्वपूर्ण व्रत है। यह व्रत हर साल सावन के शुक्ल पक्ष में मनाया जाता है। इस लेख में जानें कि क्या यह व्रत केवल बेटे की प्राप्ति के लिए है या बेटी की चाह रखने वाले दंपति भी इसे कर सकते हैं। साथ ही, जानें इस व्रत की पूजा विधि और इसके पीछे की पौराणिक कथा।
Aug 20, 2026, 17:34 IST
पुत्रदा एकादशी का महत्व
सनातन धर्म में एकादशी व्रत का अत्यधिक महत्व है, जो भगवान विष्णु को समर्पित होता है। साल में कुल 24 एकादशी तिथियां आती हैं, जिनमें से हर महीने दो एकादशी का व्रत रखा जाता है। सावन के शुक्ल पक्ष में मनाई जाने वाली पुत्रदा एकादशी इस बार 23 और 24 अगस्त 2026 को है।
एकादशी व्रत की परंपरा
हिंदू पंचांग के अनुसार, जब एकादशी तिथि सूर्योदय के समय दो दिनों तक रहती है, तो पहले दिन व्रत रखने की परंपरा है। पुत्रदा एकादशी को संतान सुख से जोड़ा जाता है। इस व्रत में 'पुत्र' शब्द होने के कारण, यह सवाल उठता है कि क्या संतान की इच्छा रखने वाले दंपति इसे कर सकते हैं। आइए जानते हैं।
क्या पुत्रदा एकादशी केवल बेटे के लिए है?
पुत्रदा एकादशी की पौराणिक कथा राजा सुकेतुमान और उनकी पत्नी से जुड़ी है, जो संतान न होने के कारण दुखी थे। पद्म पुराण के अनुसार, भगवान विष्णु ने इस एकादशी को संतान प्राप्ति से संबंधित बताया है। राजा की इच्छा पुत्र प्राप्ति की थी, और व्रत के फलस्वरूप उन्हें योग्य पुत्र मिला। इसीलिए इसे पुत्र प्राप्ति की कामना से जोड़ा गया है।
बेटी की चाह रखने वाले दंपति क्या करें?
यदि किसी दंपति को बेटी की इच्छा है, तो वे एकादशी व्रत या भगवान विष्णु की पूजा में कोई विशेष रोक नहीं मानते। वे स्वस्थ, संस्कारी और सुखी संतान की कामना के साथ व्रत रख सकते हैं। संकल्प लेते समय अपनी इच्छा को भगवान विष्णु के सामने प्रार्थना के रूप में रख सकते हैं।
धार्मिक परंपरा में समान महत्व
धार्मिक परंपरा में पुत्र और पुत्री दोनों को समान महत्व दिया गया है। मनुस्मृति में भी “पुत्रेण दुहिता समा” का उल्लेख है, जिसका अर्थ है कि पुत्री को पुत्र के समान माना गया है। संतान चाहे बेटा हो या बेटी, सबसे महत्वपूर्ण है उसका स्वस्थ, संस्कारी, सुरक्षित और सुखी होना।
बेटी की कामना के लिए पूजा विधि
एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा के साथ माता लक्ष्मी का ध्यान करना चाहिए। देवी लक्ष्मी केवल धन की देवी नहीं, बल्कि समृद्धि, सौभाग्य, ऐश्वर्य और गृहस्थ सुख से भी जुड़ी हैं।
- भगवान विष्णु को तुलसी दल अर्पित करें।
- मां लक्ष्मी को कमल और सफेद या लाल फूल अर्पित करें।
- “ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः” मंत्र का जाप करें।
- इसके बाद भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए अपनी मनोकामना प्रार्थना के रूप में रखें।
- सामर्थ्य के अनुसार जरुरतमंदों को भोजन या आवश्यक वस्तुओं का दान करें।