प्रसिद्ध शायर डॉ. बशीर बद्र का निधन, उर्दू साहित्य में छाप छोड़ने वाले
डॉ. बशीर बद्र का निधन
उर्दू साहित्य के प्रसिद्ध शायर और पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित डॉ. बशीर बद्र का निधन भोपाल में गुरुवार को हुआ। उनकी उम्र 91 वर्ष थी। जैसे ही उनके निधन की सूचना मिली, शोक की लहर फैल गई। सोशल मीडिया पर उनके प्रसिद्ध शेरों को साझा कर लोग उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार, डॉ. बशीर बद्र लंबे समय से डिमेंशिया जैसी गंभीर बीमारी से ग्रसित थे, जिसके कारण उनकी याददाश्त कमजोर हो गई थी। परिवार के करीबी लोगों का कहना है कि वे हाल के दिनों में लोगों को पहचानने में भी असमर्थ थे। उम्र से संबंधित अन्य स्वास्थ्य समस्याएं भी उनके लिए चुनौती बन गई थीं, जिसके चलते उनका निधन हुआ।
परिवार ने अभी अंतिम संस्कार की तारीख की आधिकारिक जानकारी नहीं दी है, लेकिन यह बताया जा रहा है कि उनका अंतिम संस्कार गुरुवार शाम को भोपाल में किया जा सकता है।
डॉ. बशीर बद्र का साहित्यिक सफर प्रेरणादायक रहा। उनका जन्म 15 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में हुआ। उनका असली नाम सैयद मोहम्मद बद्र था। उन्होंने बचपन से ही शायरी में रुचि दिखाई और महज सात साल की उम्र से लिखना शुरू कर दिया। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से बीए, एमए और उर्दू साहित्य में पीएचडी की डिग्री प्राप्त की। बाद में वे वहीं लेक्चरर बने।
बशीर बद्र ने उर्दू शायरी को आम लोगों की भाषा में प्रस्तुत किया। उनकी गजलों में प्रेम, तन्हाई, रिश्ते, दर्द और जीवन की सच्चाइयाँ सरल शब्दों में व्यक्त की गई हैं। उनके कुछ प्रसिद्ध शेर जैसे 'कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं कोई बेवफा नहीं होता' और 'उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए' आज भी लोगों की जुबान पर हैं।
उनकी जिंदगी में 1987 का मेरठ दंगा एक बड़ा आघात था, जिसमें उनका घर जल गया और उनकी कई किताबें और अप्रकाशित गजलें नष्ट हो गईं। इस घटना ने उन्हें गहरे तक प्रभावित किया और कुछ समय के लिए उन्होंने लिखना बंद कर दिया। बाद में वे भोपाल में बस गए।
डॉ. बशीर बद्र को उनके साहित्यिक योगदान के लिए कई पुरस्कार मिले, जिनमें भारत सरकार द्वारा दिया गया पद्मश्री भी शामिल है।