×

भगवान विष्णु और नारद मुनि का अद्भुत संवाद

इस लेख में भगवान विष्णु और नारद मुनि के बीच एक अद्भुत संवाद का वर्णन किया गया है। नारद मुनि के क्रोध और श्राप के बावजूद, भगवान विष्णु ने सकारात्मकता दिखाई। जानिए कैसे भगवान ने नारद मुनि को सांत्वना दी और उन्हें शांति का मार्ग बताया। यह कथा भक्तों के प्रति भगवान के अटल प्रेम को दर्शाती है।
 

भगवान विष्णु का भक्तों के प्रति अटल प्रेम

भगवान विष्णु की यह विशेषता है कि वे अपने भक्तों को कठिनाइयों में लंबे समय तक नहीं रहने देते। वे किसी न किसी तरीके से उन्हें संकट से बाहर निकालते हैं, भले ही इसके लिए उन्हें स्वयं कष्ट सहना पड़े।


नारद मुनि का क्रोध

देवर्षि नारद के संदर्भ में भी कुछ ऐसा ही घटित होने वाला था। उनके मन में क्रोध की ज्वाला प्रज्वलित थी। उसी उग्रता में उन्होंने कठोर शब्दों में कहा—


‘भले भवन अब बायन दीन्हा।पावहुगे फल आपन कीन्हा।।


बंचेहु मोहि जवनि धरि देहा।सोइ तनु धरहु श्राप मम एहा।।’


अर्थात—तुमने मुझे बड़ा अच्छा धोखा दिया है। इसका परिणाम तुम्हें अवश्य भोगना पड़ेगा। क्या तुमने यह समझा था कि मेरे साथ छल करके तुम बच जाओगे? जिस शरीर को तुमने धारण किया है, वही तुम्हें भी धारण करना पड़ेगा—यह मेरा श्राप है।


नारद मुनि का श्राप

वे आगे बोले—


‘कपि आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी। करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी।। मम अपकार कीन्ह तुम्ह भारी। नारि बिरहँ तुम्ह होब दुखारी।।’


तुमने मेरा रूप वानर जैसा बना दिया था, इसलिए अब वानर ही तुम्हारी सहायता करेंगे। मैंने तो केवल एक स्त्री को पाने की इच्छा की थी, लेकिन तुमने मुझे अपमानित किया है। तुम्हें भी इसके परिणाम भोगने होंगे—तुम भी स्त्री-वियोग के दुख से ग्रस्त रहोगे।


भगवान विष्णु का सकारात्मक दृष्टिकोण

भगवान विष्णु को मानो मधु के स्थान पर विष मिला। वे मुनि का कल्याण करना चाहते थे, लेकिन मुनि ने क्रोध में उन्हें श्राप दे दिया। आमतौर पर, यदि किसी के साथ ऐसा होता है, तो वह निराश हो जाता है।


लेकिन क्या भगवान विष्णु ने भी ऐसा किया? नहीं।


वे तो मुस्कुराए और श्राप को सहजता से स्वीकार किया। उन्होंने नारद मुनि को आशीर्वाद दिया और अपनी माया समेट ली।


नारद मुनि का भय

जब भगवान ने अपनी माया हटा ली, तब वहाँ न लक्ष्मी जी थीं और न ही विश्वमोहिनी। यह देखकर नारद मुनि भयभीत हो गए। वे भगवान के चरणों में गिर पड़े और करुण स्वर में बोले—हे प्रभु! मेरी रक्षा कीजिए।


भगवान विष्णु ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा—हे मुनि! भय मत करो। यह सब मेरी इच्छा से हुआ है।


नारद मुनि ने कहा—प्रभु! मैंने क्रोध में आपको कटु वचन कहे हैं। मेरे पापों का प्रायश्चित्त कैसे होगा?


प्रभु का मार्गदर्शन

भगवान ने कहा—


‘जपहु जाइ संकर सत नामा।होइहि हृदय तुरत बिश्रामा।।’


हे मुनि! जाकर भगवान शंकर के शतनाम का जप करो। इससे तुम्हारे हृदय को तुरंत शांति मिलेगी। प्रभु के गुणों का स्मरण करो, तब मेरी माया तुम्हें छू भी नहीं सकेगी।


इतना कहकर भगवान अंतर्धान हो गए। नारद मुनि श्रीराम के गुणों का गान करते हुए ब्रह्मलोक की ओर चले गए।


समापन

।।श्रीराम।।


- सुखी भारती