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भारत में डेटा सेंटरों का जल संकट: पर्यावरण पर प्रभाव

भारत में डेटा सेंटरों का तेजी से विस्तार जल संकट को और बढ़ा रहा है। ये सेंटर न केवल जल संसाधनों का अत्यधिक उपयोग कर रहे हैं, बल्कि ऊर्जा की मांग और कार्बन उत्सर्जन में भी इजाफा कर रहे हैं। इस लेख में जानें कि कैसे ये डेटा सेंटर कृषि, पीने के पानी और उद्योगों पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहे हैं, और क्या उपाय किए जा सकते हैं।
 

भारत में जल संकट और डेटा सेंटरों का प्रभाव


भारत में जल की कमी पहले से ही कृषि, पीने के पानी और उद्योगों पर नकारात्मक प्रभाव डाल रही है। डेटा सेंटरों के विस्तार से भूजल का स्तर और गिर सकता है, जिससे सूखा बढ़ेगा और किसानों की फसलें प्रभावित होंगी। इसके साथ ही, बिजली की मांग में भी वृद्धि होगी, जो कोयला-आधारित ग्रिड पर दबाव डालेगी और उत्सर्जन में इजाफा करेगी।


डिजिटल युग में डेटा सेंटर आधुनिक सभ्यता की नींव बन चुके हैं। 'क्लाउड कंप्यूटिंग', 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' (AI), और ऑनलाइन सेवाओं का हर उपयोग इन विशाल संरचनाओं पर निर्भर करता है। लेकिन यह 'क्लाउड' वास्तव में पानी और ऊर्जा की भारी खपत पर आधारित है। वैश्विक स्तर पर डेटा सेंटर जल संसाधनों को नष्ट कर रहे हैं और कार्बन उत्सर्जन को बढ़ा रहे हैं। भारत में, जहां जल संकट पहले से ही गंभीर है, नए डेटा सेंटरों का विस्तार पर्यावरण के लिए हानिकारक हो सकता है।


विश्व स्तर पर डेटा सेंटरों की जल खपत चौंकाने वाली है। एक सामान्य डेटा सेंटर प्रतिदिन लगभग 3 लाख गैलन (लगभग 11 लाख लीटर) पानी का उपयोग करता है, जबकि बड़े मेगा डेटा सेंटर 50 लाख गैलन (लगभग 1.9 करोड़ लीटर) तक पानी पी जाते हैं। यह पानी मुख्य रूप से कूलिंग टावरों में वाष्पीकरण के लिए उपयोग होता है।


अमेरिका के टेक्सास में डेटा सेंटर 2025 में 490 अरब गैलन पानी का उपयोग करने की योजना बना रहे हैं, जो 2030 तक 3990 अरब गैलन तक पहुंच सकता है। जॉर्जिया के न्यूटन काउंटी में मेटा का एक डेटा सेंटर पूरे काउंटी के पानी का 10 प्रतिशत उपयोग करता है। गूगल ने 2023 में अपने डेटा सेंटरों के लिए 50 अरब गैलन से अधिक पानी का उपयोग किया।


पानी की खपत के साथ-साथ, डेटा सेंटर प्रदूषण भी फैलाते हैं। वाष्पीकरण प्रक्रिया में रासायनिक यौगिक और भारी धातुएं अपशिष्ट जल में मिलती हैं, जो जल स्रोतों को दूषित करती हैं। गर्मी के मौसम में मांग तीन गुना बढ़ जाती है, जब सूखे का खतरा सबसे अधिक होता है।


ऊर्जा खपत और कार्बन उत्सर्जन डेटा सेंटरों के लिए अन्य गंभीर खतरे हैं। 2022 में, वैश्विक डेटा सेंटरों ने 240-340 टेरावाट-घंटे बिजली का उपयोग किया, जो वैश्विक बिजली मांग का 1-1.3 प्रतिशत है। AI के विकास के साथ, यह आंकड़ा तेजी से बढ़ रहा है।


भारत में स्थिति और भी चिंताजनक है। देश पहले से ही जल संकट का सामना कर रहा है। नासा और विश्व संसाधन संस्थान (WRI) की रिपोर्टों के अनुसार, भारत के कई बड़े शहर उच्च जल-तनाव वाले क्षेत्रों में हैं। वर्तमान में भारत में 278 से अधिक डेटा सेंटर हैं, जिनमें से 75 प्रतिशत जल-तनाव वाले राज्यों में स्थित हैं।


AI डेटा सेंटरों के विस्तार से समस्या और बढ़ गई है। अनुमान है कि भारत का AI डेटा सेंटर क्षेत्र पूर्ण क्षमता पर 375 अरब लीटर पानी सालाना उपयोग कर सकता है। विशाखापट्टनम में प्रस्तावित 15 बिलियन डॉलर का हाइपरस्केल डेटा सेंटर पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र में बन रहा है।


कुछ कंपनियां दावा करती हैं कि लिक्विड कूलिंग या क्लोज्ड-लूप सिस्टम पानी की खपत कम कर सकते हैं, लेकिन ये महंगे हैं। सरकार को सख्त नियम बनाने चाहिए और जल-तनाव वाले क्षेत्रों में नए सेंटरों पर रोक लगानी चाहिए।


डेटा सेंटर 'डिजिटल इंडिया' के सपने को साकार कर सकते हैं, लेकिन पर्यावरण की कीमत पर नहीं। यदि हम जल की लूट और प्रदूषण को नजरअंदाज करेंगे, तो भविष्य में सूखे और बिजली संकट का सामना करना पड़ेगा।