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भारत में पहला फॉरेंसिक डेंटल डेटाबेस: डेंटिस्ट की अनोखी पहल

अहमदाबाद के एक डेंटिस्ट ने 37,000 किलोमीटर की यात्रा कर भारत का पहला फॉरेंसिक डेंटल डेटाबेस तैयार किया है। इस शोध में 2.2 लाख दांतों का अध्ययन किया गया है, जो भविष्य में जटिल अपराधों को सुलझाने और मृतकों की पहचान में मदद करेगा। जानें इस अनोखी पहल के बारे में और कैसे यह जांच प्रणाली को मजबूत बनाएगी।
 

अहमदाबाद के डेंटिस्ट की ऐतिहासिक उपलब्धि

अहमदाबाद: एक डेंटिस्ट ने विज्ञान और फॉरेंसिक के क्षेत्र में एक अनूठा कार्य किया है, जो भारत के इतिहास में अद्वितीय है। उन्होंने लगभग 37,000 किलोमीटर की यात्रा करके देश का पहला फॉरेंसिक डेंटल डेटाबेस तैयार किया है। इस परियोजना में करीब पांच वर्षों की मेहनत के बाद 23 राज्यों से नमूने एकत्रित किए गए और 2.2 लाख से अधिक दांतों का गहन अध्ययन किया गया। यह अनुसंधान भविष्य में जटिल अपराधों को सुलझाने और बड़े हादसों में मृतकों की पहचान में जांच एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा।


दांतों से मिली भौगोलिक और जातीय पहचान

डॉ. जयशंकर पी. पिल्लई, गवर्नमेंट डेंटल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के विशेषज्ञ, ने इस महत्वपूर्ण शोध की शुरुआत एक महत्वपूर्ण प्रश्न से की। उन्होंने यह जानने का प्रयास किया कि क्या केवल दांतों के आधार पर किसी अज्ञात व्यक्ति की पहचान, उसके क्षेत्र और पृष्ठभूमि का सटीक पता लगाया जा सकता है। इस रहस्य को सुलझाने के लिए उन्होंने 2020 से 2025 के बीच लाखों नमूने इकट्ठा किए। उनके अध्ययन से पता चला कि भारत जैसे विविधता वाले देश में विभिन्न राज्यों के लोगों के दांतों की संरचना में स्पष्ट अंतर होता है।


दांत: इंसान का प्राकृतिक पहचान पत्र

इस शोध का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि दांत मानव शरीर का सबसे मजबूत और टिकाऊ हिस्सा होते हैं। भयंकर आग, बाढ़, या वर्षों तक मिट्टी में दबे रहने के बावजूद दांत सुरक्षित रहते हैं। यही कारण है कि फॉरेंसिक विशेषज्ञ अब दांतों को इंसान का 'प्राकृतिक पहचान पत्र' मानते हैं। डॉ. पिल्लई के अध्ययन ने यह साबित किया है कि दांतों की विशेषताएँ, जैसे सामने के दांतों की संरचना, किसी व्यक्ति की पहचान के लिए अत्यंत उपयोगी हैं।


भारत में जांच प्रणाली को मजबूत बनाने की दिशा में कदम

डॉ. पिल्लई का मानना है कि भारत में डेंटल रिकॉर्ड रखने की प्रणाली पश्चिमी देशों की तुलना में कमजोर है। जांच एजेंसियों को कई बार केवल तस्वीरों या सीमित सबूतों पर निर्भर रहना पड़ता है। यह नया डेटाबेस एक महत्वपूर्ण संसाधन साबित होगा। वर्तमान में, दांत के ऊपरी हिस्से के आधार पर व्यक्ति की पहचान केवल 14.3 प्रतिशत मामलों में हो पा रही है, लेकिन शोधकर्ताओं को विश्वास है कि एआई और उन्नत तकनीक के माध्यम से इसे और सटीक बनाया जा सकेगा।