मां चंडिका धुरा मंदिर: उत्तराखंड का आध्यात्मिक केंद्र
मां चंडिका धुरा मंदिर का महत्व
पिथौरागढ़: उत्तराखंड में शक्ति उपासना के कई प्राचीन स्थल हैं, जिनमें से एक है 'मां चंडिका धुरा मंदिर'। यह मंदिर घने जंगलों और पहाड़ों से घिरा हुआ है, जो इसे एक शांत और आकर्षक स्थान बनाता है।
चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान यहां विशेष मेलों और अनुष्ठानों का आयोजन होता है, जिसमें श्रद्धालु दूर-दूर से आते हैं। हालांकि, अक्टूबर से मार्च के बीच यहां आना सबसे अच्छा माना जाता है। मानसून में पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन का खतरा होता है, इसलिए इस समय यात्रा से बचना चाहिए।
हाल ही में, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस मंदिर के बारे में एक वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साझा किया। उन्होंने लिखा, "पिथौरागढ़ में स्थित मां चंडिका धुरा मंदिर देवी महाकाली को समर्पित एक महत्वपूर्ण आस्था का केंद्र है। यह स्थान आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा हुआ है और इसकी प्राकृतिक सुंदरता भी अद्वितीय है।"
मंदिर की प्राचीन वास्तुकला, गर्भगृह में स्थित रहस्यमयी कुंड और यहां का शांत वातावरण हर किसी को आकर्षित करता है। मां चंडिका को न्याय, शक्ति और संरक्षण का प्रतीक माना जाता है।
'मां चंडिका धुरा मंदिर' पिथौरागढ़ नगर से लगभग 10 किलोमीटर दूर स्थित है। स्थानीय पहाड़ी भाषा में 'धुरा' का अर्थ ऊंची चोटी होता है। इसे 'उड़ियार देवी' भी कहा जाता है क्योंकि यह पहाड़ी के गर्भ में स्थित है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, 15वीं शताब्दी में रामगंगा तट पर स्थित चंडिका घाट से माता के लिंग रूप को लाकर इस ऊंची चोटी पर स्थापित किया गया था। चंडिका घाट को मां का मूल स्थान माना जाता है।
पुरानी कथा के अनुसार, मां चंडिका का मूल स्थान बुंगाछीना के हरदेव क्षेत्र में था, जहां उनकी बहन मां महानंदा देवी का भी मंदिर था। स्वभाव में भिन्नता के कारण मां नंदा के कहने पर चंडिका जी ने वह स्थान छोड़कर रामगंगा तट पर आकर विराजमान हुईं।