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माइक्रोग्रैविटी का इम्यून सिस्टम पर प्रभाव: अंतरिक्ष में नई खोजें

अंतरिक्ष में माइक्रोग्रैविटी का इम्यून सिस्टम पर प्रभाव एक महत्वपूर्ण विषय है। वैज्ञानिकों ने नए उपकरणों की मदद से यह समझने की कोशिश की है कि कैसे माइक्रोग्रैविटी इन्फेक्शन से लड़ने की क्षमता को प्रभावित करती है। इस अध्ययन से पता चला है कि लंबे अंतरिक्ष मिशनों में अंतरिक्ष यात्रियों को विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। जानें इस शोध के परिणाम और इसके संभावित उपचारों के बारे में।
 

माइक्रोग्रैविटी और इम्यून सिस्टम

नई दिल्ली: अंतरिक्ष मिशनों में माइक्रोग्रैविटी और रेडिएशन जैसी चुनौतियाँ इम्यून सिस्टम पर गंभीर प्रभाव डालती हैं। अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) पर मौजूद अंतरिक्ष यात्रियों के इम्यून सिस्टम पर माइक्रोग्रैविटी के प्रभाव को समझने के लिए वैज्ञानिक लगातार अध्ययन कर रहे हैं। यूरोपियन स्पेस एजेंसी (ईएसए) की 'इम्यून एसे' परियोजना में क्रू सदस्यों के रक्त के नमूनों से सेलुलर इम्यून फंक्शन की निगरानी की जा रही है।


2023 में किए गए ग्राउंड स्टडीज से यह स्पष्ट हुआ है कि माइक्रोग्रैविटी या अलग-थलग रहने से इन्फेक्शन से लड़ने की क्षमता में कमी आती है। अब एक नई डिवाइस की मदद से यह परीक्षण अंतरिक्ष में भी संभव हो गया है, जो पहले केवल धरती पर किया जा सकता था। इस डिवाइस का नाम 'इम्यून एसे' है, जिसका उद्देश्य उड़ान के दौरान इम्यून सिस्टम में होने वाले परिवर्तनों को सटीकता से ट्रैक करना है। इस नए उपकरण से शोधकर्ताओं को अधिक स्पष्ट डेटा प्राप्त हो रहा है, जो स्पेस और धरती दोनों जगह इम्यून मॉनिटरिंग के लिए उपयोगी साबित हो सकता है।


यह अध्ययन लंबे अंतरिक्ष मिशनों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। यदि इम्यून सिस्टम में परिवर्तन जल्दी पहचाने जाएं, तो बीमारियों की शुरुआत को रोककर अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है। माइक्रोग्रैविटी इम्यून सेल्स में ऐसे परिवर्तन लाती है, जो उम्र बढ़ने या इम्यूनोसेनेसेंस के समान होते हैं, लेकिन यह प्रक्रिया बहुत तेजी से होती है। इससे उन सेल्स पर असर पड़ता है, जो ऊतकों की मरम्मत और पुनर्जनन में मदद करते हैं। 'इम्यूनोसेनेसेंस' अध्ययन इस बात पर ध्यान केंद्रित कर रहा है कि क्या उड़ान के बाद ये परिवर्तन ठीक हो जाते हैं।


माइक्रोग्रैविटी का उपयोग इम्यून एजिंग को तेज करने के उपकरण के रूप में करने से स्टेम सेल बायोलॉजी में नई जानकारियाँ मिल सकती हैं। इससे धरती पर बुजुर्गों के कमजोर इम्यून सिस्टम के लिए बेहतर उपचार विकसित किए जा सकते हैं। पहले के अध्ययन 'टी-सेल एक्ट इन एजिंग' में वैज्ञानिकों ने दिखाया कि ग्रैविटी टी-सेल एक्टिवेशन को प्रभावित करती है। टी-सेल्स इम्यून सिस्टम को सही निर्देश देते हैं।


माइक्रोग्रैविटी में कुछ विशेष जीन डाउन रेगुलेट हो जाते हैं, जिससे सेल रिस्पॉन्स कमजोर पड़ता है। इससे प्रो-इंफ्लेमेटरी रिएक्शन घटता है, हीलिंग धीमी होती है, साइटोकिन्स या सेल कम्युनिकेशन प्रोटीन की मात्रा कम हो जाती है और सेल मल्टीप्लिकेशन की क्षमता घट जाती है। नतीजतन, इन्फेक्शन से सुरक्षा कमजोर हो जाती है।


एक और महत्वपूर्ण अध्ययन 'इंटीग्रेटेड इम्यून' में उड़ान से पहले, दौरान और बाद में रक्त, यूरिन और लार के नमूनों का विश्लेषण किया गया। इससे पता चला कि लंबे मिशनों में अंतरिक्ष यात्रियों को स्किन रैश, सांस की तकलीफ, बोन रिसॉर्प्शन, किडनी स्टोन और इम्यून डिसरेगुलेशन जैसी समस्याएं होती हैं। बिना बेहतर पोषण और दवाओं के ये जोखिम बढ़ सकते हैं।


ईएसए की 'इम्यूनो' जांच से पता चला कि टोल-लाइक रिसेप्टर्स (टीएलआर) में उड़ान के बाद बदलाव आते हैं, जो हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग री-अडैप्टेशन दिखाते हैं। इससे स्ट्रेस रिस्पॉन्स और प्रो-इंफ्लेमेटरी स्थिति का संकेत मिलता है। 'इम्यूनो-2' जांच ने इसे आगे बढ़ाया। इसमें खून, लार, सांस, बाल के नमूनों के साथ ईसीजी, ब्लड ऑक्सीजन, एक्टिविटी और साइकोलॉजिकल टेस्टिंग शामिल है। ये सभी जांच स्पेस में इम्यून सिस्टम के अनुकूलन को समझने में मदद कर रही हैं। इससे लंबे मिशन के लिए दवाएं और नए उपकरण विकसित करने में वैज्ञानिकों को और भी सहायता मिलेगी।