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राजनाथ सिंह ने शिक्षा में संस्कारों की आवश्यकता पर जोर दिया

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हाल ही में शिक्षा में संस्कारों की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि केवल डिग्री प्राप्त करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि शिक्षा के साथ-साथ नैतिकता और सदाचार का विकास भी आवश्यक है। भूपाल नोबल्स यूनिवर्सिटी के स्थापना दिवस पर उन्होंने उच्च शिक्षा में वृद्धि और नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के महत्व पर चर्चा की। राजनाथ सिंह ने बताया कि भारत अब दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बन चुका है। उन्होंने विश्वविद्यालयों में शोध के उद्देश्य और शिक्षकों की भूमिका पर भी प्रकाश डाला।
 

शिक्षा और संस्कार का महत्व

हाल ही में एक आतंकवादी मॉड्यूल में डॉक्टरों की भागीदारी पर चिंता व्यक्त करते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि केवल डिग्री हासिल करना ही पर्याप्त नहीं है; शिक्षा के साथ-साथ संस्कार भी अनिवार्य हैं। उन्होंने यह सवाल उठाया कि जो डॉक्टर हमेशा 'आरएक्स' लिखते हैं, वे 'आरडीएक्स' कैसे लिख सकते हैं। यह प्रश्न हमें आत्म-विश्लेषण के लिए प्रेरित करता है। शिक्षा का उद्देश्य केवल पेशेवर सफलता नहीं, बल्कि नैतिकता, सदाचार और मानवीय व्यक्तित्व का विकास भी होना चाहिए। यही भारतीय शिक्षा का मूल सिद्धांत है, जो समाज में समरसता और शांति को बढ़ावा देता है।


उच्च शिक्षा में वृद्धि

भूपाल नोबल्स यूनिवर्सिटी के 104वें स्थापना दिवस पर बोलते हुए, रक्षा मंत्री ने कहा कि किसी राष्ट्र का भविष्य उसके विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में आकार लेता है। उन्होंने बताया कि पिछले 11 वर्षों में उच्च शिक्षा संस्थानों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वर्ष 2014-15 में देश में 51,000 से अधिक उच्च शिक्षा संस्थान थे, जबकि जून 2025 तक यह संख्या 70,000 से अधिक होने की उम्मीद है। इस दौरान आईआईटी, एम्स और आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों की संख्या में भी वृद्धि हुई है।


नई शिक्षा नीति का महत्व

राजनाथ सिंह ने कहा कि आज की शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री प्रदान करना नहीं, बल्कि ऐसे विचारशील व्यक्तियों का निर्माण करना है जो देश का नेतृत्व कर सकें। इसी दिशा में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनाई गई है। उन्होंने बताया कि भारत अब 1.59 लाख स्टार्टअप्स के साथ दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बन चुका है, जो मजबूत संस्थागत ढांचे और नीति सुधारों का परिणाम है।


शोध का उद्देश्य

उन्होंने जोर देकर कहा कि विश्वविद्यालयों में होने वाली रिसर्च का अंतिम लक्ष्य केवल जर्नल में प्रकाशित होना नहीं होना चाहिए, बल्कि इसका उद्देश्य धरातल पर उपयोगी परिवर्तन लाना होना चाहिए—चाहे वह नीति निर्माण हो, स्टार्टअप्स हों या नई इंडस्ट्री का विकास। रक्षा मंत्री ने कहा कि आज ज्ञान, डेटा और सूचना की कोई कमी नहीं है, लेकिन विजडम की कमी है। भारत अब दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और 2030 तक तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है।


शिक्षकों की भूमिका

इस गति को बनाए रखने के लिए संस्कारित और कुशल मानव संसाधन की आवश्यकता है, जिसमें विश्वविद्यालयों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स में भारत की रैंक 2014 में 76 थी, जो 2024 में सुधरकर 39 हो गई है। डिजिटल अर्थव्यवस्था का राष्ट्रीय आय में योगदान भी लगातार बढ़ रहा है।


चौथी औद्योगिक क्रांति

रक्षा मंत्री ने कहा कि हम चौथी औद्योगिक क्रांति के साक्षी बन रहे हैं, जिसके कारण आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग और अन्य नई तकनीकें हमारे जीवन और कार्यशैली को तेजी से बदल रही हैं। भारत इन क्षेत्रों में तभी आगे बढ़ सकता है, जब शिक्षा व्यवस्था में रिसर्च, डेवलपमेंट और इनोवेशन को बढ़ावा दिया जाए और निरंतर सीखने की प्रवृत्ति अपनाई जाए।


शिक्षा नीति का दृष्टिकोण

उन्होंने कहा कि किसी भी सशक्त शिक्षा व्यवस्था का सबसे मजबूत स्तंभ शिक्षक होते हैं। वर्ष 2018 की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 54 प्रतिशत अभिभावक चाहते हैं कि उनके बच्चे शिक्षक बनें, क्योंकि भारतीय समाज में शिक्षक को सदैव सम्मान की दृष्टि से देखा गया है।


भारतीय ज्ञान परंपरा

राजनाथ सिंह ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 इसी दृष्टिकोण के साथ शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन लाती है। यह नीति भारतीय ज्ञान प्रणाली को शिक्षा के केंद्र में स्थापित करती है और सांस्कृतिक व बौद्धिक विरासत के पुनर्जीवन का मार्ग प्रशस्त करती है। भारतीय ज्ञान परंपरा में आस्था और विज्ञान, लौकिक और आध्यात्मिक, कर्म और धर्म तथा भोग और त्याग के बीच अद्भुत संतुलन दिखाई देता है।


भारत का बौद्धिक योगदान

उन्होंने कहा कि भारत ने दुनिया को केवल श्रेष्ठ वैज्ञानिक, गणितज्ञ और डॉक्टर ही नहीं, बल्कि महान संत और दार्शनिक भी दिए हैं। चरक, सुश्रुत, आर्यभट्ट, वराहमिहिर, भास्कराचार्य, ब्रह्मगुप्त, माधव, पाणिनि, पतंजलि, नागार्जुन, पिंगल, मैत्रेयी, गार्गी और तिरुवल्लुवर जैसे महान विद्वान भारत की बौद्धिक परंपरा के प्रतीक हैं।