सेवानिवृत्त अधिकारियों की किताबें: सच या पछतावा?
सत्य का सामना
हम सत्य का जश्न तब मनाते हैं जब यह किसी को हानि नहीं पहुँचाता। अधिकारियों को यह याद रखना चाहिए कि पछतावे की किताबें अच्छी बिक्री कर सकती हैं, लेकिन सच्ची संस्थाएं उन लोगों से बनती हैं जो पछतावे के लिए सामग्री नहीं इकट्ठा करते। नियमों की किताब हाथ में हो और रीढ़ मजबूत हो, तो सेवानिवृत्ति पर सनसनी की आवश्यकता कम होती है। लोकतंत्र को समय पर दर्ज हिम्मत की आवश्यकता होती है, न कि बाद के रहस्यों की।
साहित्यिक प्रवृत्तियाँ
भारत में हाल के दिनों में एक नया साहित्यिक चलन देखने को मिल रहा है। सेवानिवृत्त अधिकारी अक्सर किताबें, साक्षात्कार और पॉडकास्ट के माध्यम से वे बातें साझा करते हैं जो वे अपने कार्यकाल के दौरान नहीं कह सके। यह दावा किया जाता है कि अब ‘सच’ सामने आ रहा है। लेकिन सवाल यह है कि यह सच पहले क्यों नहीं आया जब इससे शासन की दिशा बदल सकती थी?
अधिकारी अक्सर राजनीतिक दबाव, तबादले, और परिवार के लिए सुविधाओं का हवाला देते हैं। वे जानते हैं कि नोट पर असहमति लिखना संभव है, लेकिन इसके बाद अकेले पड़ने का डर भी होता है। कई बार नियमों की किताब हाथ में होती है, लेकिन करियर की किताब अधिक भारी पड़ती है। मौखिक आदेश चलते हैं और असुविधाजनक सत्य को टाल दिया जाता है।
दोहरे मापदंड
सेवानिवृत्त अधिकारियों द्वारा किए गए खुलासे अक्सर दोहरे मापदंड को उजागर करते हैं। जब कोई व्यक्ति जो सत्ता के निकट रहा, यह कहता है कि निर्णय संविधान या प्रक्रिया से नहीं, बल्कि दबाव से हुए, तो जनता पूछती है कि ‘तब आप कहां थे?’ विपक्ष इसे हथियार बनाता है, जबकि सत्ता इसे विश्वासघात मानती है।
आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम और अखिल भारतीय सेवाओं के आचरण नियम यह याद दिलाते हैं कि सरकारें अपने आंतरिक मामलों को सार्वजनिक नहीं करना चाहती। विवाद इसलिए बढ़ता है क्योंकि किताबें अक्सर आधा इतिहास और आधी आत्मरक्षा होती हैं।
सुधार की संभावनाएँ
हालांकि, ऐसे खुलासों का कुछ लाभ भी होता है। जब सेवानिवृत्त अधिकारी प्रक्रिया, दबाव और समझौतों का ब्योरा देते हैं, तो शोधार्थी और अगली पीढ़ी समझ सकती है कि नीति कैसे बनती है। कभी-कभी इससे सुधार की बहस भी शुरू होती है।
यहां सबसे कठिन प्रश्न यह है कि यदि सेवाकाल में राजनीतिक आकाओं की कृपा का अपेक्षित प्रतिफल नहीं मिला, तो बाद में पर्दाफाश से अधिकारी को क्या मिलता है? अक्सर तीन चीजें मिलती हैं: ध्यान, बाजार और आत्म-औचित्य।
सत्य का महत्व
सेवानिवृत्ति के बाद बोलना पूरी तरह से बंद नहीं होना चाहिए। कुछ बातें राष्ट्रीय सुरक्षा या चल रही जांच के कारण तुरंत नहीं कही जा सकतीं। लेकिन सिद्धांत यह होना चाहिए कि जो कहा जा सकता था और नहीं कहा गया, उसका श्रेय बाद में नहीं लिया जा सकता।
अंत में, यह प्रवृत्ति हमारे देश के प्रशासनिक जीवन की कमजोरी को दर्शाती है। अधिकारी को याद रखना चाहिए कि पछतावे की किताबें अच्छी बिक सकती हैं, लेकिन अच्छी संस्थाएं उन लोगों से बनती हैं जो पछतावे के लिए सामग्री जमा नहीं करते।