11 सितंबर 2001: अमेरिका पर हुए हमले की 25वीं बरसी पर गहराई से नजर
एक ऐतिहासिक दिन का दर्दनाक स्मरण
नई दिल्ली: 11 सितंबर 2001 की सुबह ने न केवल अमेरिका, बल्कि पूरी दुनिया के इतिहास को एक झटके में बदल दिया। आतंकवादियों द्वारा किए गए इस भयानक हमले के 25 साल बाद, अमेरिका में इस त्रासदी की याद में कार्यक्रमों की एक नई श्रृंखला आयोजित की जा रही है। उस दिन, चार अमेरिकी विमानों को आतंकियों ने अपहरण कर लिया और उन्हें देश के प्रमुख और रणनीतिक स्थलों पर टकरा दिया। न्यूयॉर्क की ऊंची इमारतों से उठता काला धुआं और चारों ओर फैली धूल उस तबाही का गवाह बनी, जिसकी टीस आज भी महसूस होती है।
हमलों का भयावह दृश्य
न्यूयॉर्क में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के 110-मंजिला 'ट्विन टावर्स' पर महज 17 मिनट के अंतराल में दो विमानों ने टकराया। आग की लपटों में घिरी इन इमारतों की ऊपरी मंजिलों पर लोग फंस गए और देखते ही देखते, दो घंटे से भी कम समय में दोनों विशालकाय टावर ताश के पत्तों की तरह ढह गए। तीसरा विमान वाशिंगटन डीसी में पेंटागन के पश्चिमी हिस्से पर गिरा, जबकि चौथा विमान पेंसिलवेनिया के एक मैदान में दुर्घटनाग्रस्त हुआ। माना जाता है कि इस अंतिम विमान का असली निशाना अमेरिकी संसद भवन 'कैपिटल बिल्डिंग' था।
तबाही का दर्द और अपनों को खोने का जख्म
इस अभूतपूर्व हमले में अपहरणकर्ताओं को छोड़कर कुल 2,977 मासूम लोगों ने अपनी जान गंवा दी। न्यूयॉर्क शहर में सबसे अधिक तबाही हुई, जहां अकेले ट्विन टावर्स की गिरावट में 2,606 लोग मारे गए। पेंटागन हमले में 125 लोग काल के गाल में समा गए, जबकि चारों उड़ानों में मौजूद सभी 246 यात्रियों और चालक दल के सदस्यों की भी मौत हो गई। मरने वालों में दो साल की बच्ची क्रिस्टीन ली हैन्सन से लेकर 82 वर्ष के बुजुर्ग रॉबर्ट नॉर्टन तक शामिल थे। इस त्रासदी ने न्यूयॉर्क के 441 राहतकर्मियों को भी शहीद कर दिया।
हमलावरों की योजना और जवाबी कार्रवाई
अफगानिस्तान में अल-कायदा और उसके नेता ओसामा बिन लादेन ने इस खूनी साजिश की योजना बनाई। इस पूरे षड्यंत्र का मुख्य सूत्रधार खालिद शेख मोहम्मद था, जिसने अमेरिका में ट्रेनिंग लेने वाले 19 आतंकियों की टीम तैयार की। इनमें से अधिकांश हमलावर सऊदी अरब के नागरिक थे। हमले के एक महीने बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला किया, लेकिन बिन लादेन को 2011 में जाकर पाकिस्तान में ढेर किया जा सका। इस त्रासदी की न्याय प्रक्रिया आज भी धीमी गति से चल रही है।
न्याय की धीमी रफ्तार
क्यूबा के गुआंतानामो बे में कैद खालिद शेख मोहम्मद और उसके साथियों पर वर्षों बाद भी औपचारिक मुकदमा अंतिम अंजाम तक नहीं पहुंच सका है। पहले मौत की सजा के बदले उम्रकैद का सौदा किया गया था, लेकिन सरकारी आपत्तियों के कारण इसे खारिज कर दिया गया। अब 2028 में संभावित ट्रायल इस बात का प्रमाण है कि 25 साल बीत जाने के बाद भी उस काले दिन के जख्म पूरी तरह नहीं भर पाए हैं।