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पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच बढ़ता संघर्ष: क्या होगा क्षेत्रीय स्थिरता का?

पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच बढ़ते संघर्ष ने क्षेत्रीय स्थिरता को खतरे में डाल दिया है। हूती विद्रोहियों के खिलाफ पाकिस्तान की सैन्य कार्रवाई से भारत के लिए भी खतरे की घंटी बज रही है। क्या ईरान भी इस जंग में शामिल होगा? जानिए इस जटिल स्थिति के संभावित परिणाम और भारत पर इसके प्रभाव।
 

संघर्ष की नई लहर

हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच लड़ाई में तेजी आई है। पाकिस्तान और तुर्की ने मक्का समझौते को सक्रिय कर दिया है। हाल ही में, पाकिस्तान ने तुर्की के साथ मिलकर अपने सैनिकों को यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ तैनात करने की घोषणा की। इस स्थिति के चलते भारत के लिए खतरा बढ़ गया है, क्योंकि हूती विद्रोही पहले ही पाकिस्तान को संघर्ष से दूर रहने की सलाह दे चुके हैं। इस्लामाबाद का सैन्य हस्तक्षेप मध्य-पूर्व के संघर्ष में उसकी भागीदारी को बढ़ा सकता है।


हूती विद्रोहियों की तैयारी

पाकिस्तान और तुर्की के युद्ध में शामिल होने की घोषणा के बाद, हूती विद्रोहियों ने युद्ध की तैयारी शुरू कर दी है। यह संभावना है कि वे पाकिस्तान के सैन्य हस्तक्षेप के जवाब में कराची या ग्वादर जैसे महत्वपूर्ण बंदरगाहों को निशाना बना सकते हैं। इसके अलावा, हिंद महासागर, लाल सागर और होर्मुज की खाड़ी में पाकिस्तान के खिलाफ नाकेबंदी की जा सकती है। यदि ऐसा होता है, तो समुद्री क्षेत्र में संघर्ष छिड़ सकता है।


शिया-सुन्नी संघर्ष की आशंका

यमन के हूती विद्रोहियों को ईरान का समर्थन प्राप्त है, जो शिया मुस्लिम संप्रदाय से संबंधित हैं। वहीं, सऊदी अरब के साथ खड़े पाकिस्तान और तुर्की सुन्नी संप्रदाय से हैं। इस संघर्ष को वैश्विक स्तर पर शिया और सुन्नी के दृष्टिकोण से देखा जा रहा है। पाकिस्तान में शिया मुसलमानों की बड़ी संख्या है, विशेषकर जम्मू-कश्मीर, कराची और खैबर पख्तूनख्वा में। हूती विद्रोहियों के खिलाफ पाकिस्तान का यह कदम देश के भीतर नए संघर्ष को जन्म दे सकता है।


ईरान की संभावित भागीदारी

यदि मक्का गठबंधन की कार्रवाई से हूती विद्रोहियों की स्थिति कमजोर होती है, तो ईरान सीधे युद्ध में शामिल हो सकता है। 2019 में, हूती विद्रोहियों पर हमले के जवाब में ईरान ने सऊदी अरब पर मिसाइलों से हमला किया था। यदि ईरान फिर से ऐसा करता है, तो क्या पाकिस्तान अपने पड़ोसी से भिड़ेगा? यह भी संभव है कि ईरान अन्य खाड़ी देशों की तरह पाकिस्तान के खिलाफ मोर्चा खोले।


पाकिस्तान की परमाणु शक्ति

तुर्की और सऊदी अरब इस मामले को इस तरह पेश कर रहे हैं कि पाकिस्तान की परमाणु शक्ति यमन में सक्रिय हो गई है। दोनों देश इसे निवारक कदम के रूप में देख रहे हैं। लेकिन ईरान के लिए परमाणु शक्ति से भिड़ना कोई नई बात नहीं है। तेहरान पिछले छह महीनों से अमेरिका और इजरायल जैसे परमाणु संपन्न देशों से लड़ाई कर रहा है। ऐसे में पाकिस्तान से भिड़ना उनके लिए मुश्किल नहीं होगा।


इस्लामाबाद का अलगाव

पाकिस्तान में मक्का पैक्ट को लेकर चर्चा तेज हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान को बिना वजह संघर्ष में घसीटा जा सकता है। इस्लामाबाद ईरान और यमन के संकट में फंस सकता है। यदि ईरान के साथ संबंध बिगड़ते हैं, तो पाकिस्तान क्षेत्र में अलग-थलग पड़ जाएगा, क्योंकि उसके अफगानिस्तान और भारत के साथ पहले से ही खराब संबंध हैं।


भारत पर प्रभाव

हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के हवाई क्षेत्र से बचने की चेतावनी दी है। यदि पाकिस्तान के साथ युद्ध होता है, तो अरब सागर के माध्यम से मध्य-पूर्व का हवाई मार्ग भी खतरे में पड़ सकता है। लाल सागर, अदन की खाड़ी और अरब सागर में भी संघर्ष की संभावना है। ईरान और हूती विद्रोहियों की योजना युद्ध को हिंद महासागर तक लाने की है, जिससे अधिक देशों पर प्रभाव पड़े और अमेरिका पर दबाव बढ़ सके।


यमन में चल रही भीषण लड़ाई

लगभग एक महीने से चल रही लड़ाई में सऊदी अरब ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त यमन सरकार की सेना को सऊदी अरब से भारी सहायता मिल रही है। 100 से अधिक लड़ाकू विमान युद्ध में शामिल हो चुके हैं। लाल सागर तट से राजधानी सना तक भीषण लड़ाई चल रही है। सऊदी अरब के हमलों के जवाब में, हूती विद्रोहियों ने राबिग स्थित अरामको प्लांट और रियाद के किंग खालिद एयरपोर्ट पर हमले किए हैं।