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अमेरिका-ईरान तनाव: सीजफायर समझौते पर फिर से उठे सवाल

अमेरिका और ईरान के बीच जून में हुए सीजफायर समझौते को लेकर तनाव फिर से बढ़ता दिखाई दे रहा है। दोनों देश एक-दूसरे पर समझौते के उल्लंघन का आरोप लगा रहे हैं। इजरायल के पूर्व वार्ताकार डेनियल लेवी के बयान ने इस विवाद को नया मोड़ दिया है, जिसमें उन्होंने अमेरिका पर कई महत्वपूर्ण प्रावधानों को लागू करने में विफल रहने का आरोप लगाया है। जानें इस समझौते का उद्देश्य क्या था और इसके भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।
 

सीजफायर समझौते में बढ़ता तनाव


नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच जून में हुए सीजफायर समझौते को लेकर हालात फिर से तनावपूर्ण होते जा रहे हैं। दोनों देश एक-दूसरे पर समझौते की शर्तों का उल्लंघन करने का आरोप लगा रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर समझौते का पालन न करने का आरोप लगाया है, जबकि तेहरान का कहना है कि अमेरिका ने अपने वादों से मुंह मोड़ते हुए सैन्य दबाव और प्रतिबंधों की नीति को जारी रखा है।


इसी बीच, इजरायल के पूर्व वार्ताकार डेनियल लेवी के बयान ने इस विवाद को नया मोड़ दिया है। उनका कहना है कि अमेरिका कई महत्वपूर्ण प्रावधानों को लागू करने में असफल रहा, जिससे ईरान का विश्वास कमजोर हुआ और तनाव फिर से बढ़ने लगा।


समझौते का उद्देश्य क्या था?

रिपोर्टों के अनुसार, जून में हुए अंतरिम समझौते का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच बढ़ते सैन्य तनाव को कम करना था। हालांकि, इसके तुरंत बाद ही दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर समझौते का उल्लंघन करने के आरोप लगाने शुरू कर दिए। ईरान का कहना है कि अमेरिका लगातार सैन्य गतिविधियों और नए प्रतिबंधों के जरिए समझौते की भावना का उल्लंघन कर रहा है। इसके जवाब में अमेरिका का आरोप है कि ईरान ने व्यावसायिक जहाजों और अन्य ठिकानों पर हमले कर सबसे पहले समझौते का उल्लंघन किया।


विवाद का मुख्य केंद्र होर्मुज जलमार्ग बना हुआ है। समझौते में इस समुद्री मार्ग से गुजरने वाले व्यावसायिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने का प्रावधान था। लेकिन हाल के हमलों के बाद दोनों पक्ष एक-दूसरे को इन घटनाओं के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, जिससे युद्धविराम पर विश्वास और कमजोर हुआ है।


वादों का पालन नहीं हुआ

डेनियल लेवी ने एक साक्षात्कार में कहा कि अमेरिका समझौते की कुछ प्रमुख शर्तों को लागू करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध नहीं दिखा। उनके अनुसार, समझौते में जिस समुद्री मार्ग का उल्लेख था, उसके बजाय अमेरिका ने जहाजों के लिए अलग रूट अपनाने पर जोर दिया, जो मूल सहमति का हिस्सा नहीं था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि ईरान की संपत्तियों को मुक्त करने जैसे वादों को भी पूरा नहीं किया गया।


लेवी का मानना है कि इन घटनाओं के कारण ईरान को यह संदेश मिला कि अमेरिका समझौते को ईमानदारी से लागू नहीं करना चाहता। इसके चलते दोनों देशों के बीच अविश्वास और बढ़ गया है तथा क्षेत्र में एक बार फिर तनाव गहराने की आशंका जताई जा रही है। फिलहाल दोनों देश एक-दूसरे पर समझौता तोड़ने का आरोप लगा रहे हैं, जबकि युद्धविराम का भविष्य अनिश्चित बना हुआ है।