अमेरिका का तुर्की के प्रति नया रुख: इजराइल के लिए चिंता का विषय
अमेरिका और तुर्की के बीच बढ़ती नजदीकियां
अमेरिका ने इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू के सामने तुर्की का नाम लेते हुए एक ऐसा बयान दिया है, जिसने वैश्विक स्तर पर हलचल मचा दी है। यह सवाल उठता है कि ट्रंप का असली इरादा क्या है। फ्लोरिडा में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान, ट्रंप ने तुर्की के राष्ट्रपति की प्रशंसा की और उसे अपना मित्र बताया। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका तुर्की को एफ-35 फाइटर जेट देने पर गंभीरता से विचार कर रहा है। यह बयान इजराइल के लिए एक बड़ा झटका है, क्योंकि तुर्की और इजराइल के बीच लंबे समय से तनावपूर्ण संबंध रहे हैं।
सीरिया, गाजा और पूर्वी भूमध्य सागर में दोनों देशों के हितों में टकराव देखा गया है। 2019 में, अमेरिका ने तुर्की को एफ-35 कार्यक्रम से बाहर कर दिया था, जब तुर्की ने रूस से S400 मिसाइल सिस्टम खरीदा था। अब ट्रंप का यह नया रुख कई सवाल खड़े कर रहा है।
एफ-35 का महत्व और क्षेत्रीय संतुलन
एफ-35 को दुनिया के सबसे आधुनिक लड़ाकू विमानों में गिना जाता है। इजराइल का मानना है कि यदि तुर्की को ये विमान मिलते हैं, तो क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में बदलाव आ सकता है। खासकर सीरिया जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में तुर्की की सैन्य ताकत में वृद्धि हो सकती है। इजराइल नहीं चाहता कि इस क्षेत्र में कोई भी सैन्य बढ़त हासिल करे।
इजराइल और तुर्की के बीच तनाव केवल हथियारों तक सीमित नहीं है। दोनों देशों के हित सीरिया, गाजा और पूर्वी भूमध्य सागर में टकराते हैं। 23 दिसंबर को ग्रीस, साइप्रस और इजराइल के त्रिपक्षीय सम्मेलन में नेतन्याहू ने तुर्की को चेतावनी दी थी। इस बीच, इजराइल ने सोमा लीलैंड को मान्यता दी है, जो एक विवादित क्षेत्र है।
तुर्की की प्रतिक्रिया और क्षेत्रीय प्रभाव
इस कदम के बाद तुर्की, पाकिस्तान और कई मुस्लिम देशों में नाराजगी देखी गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इजराइल का यह कदम लाल सागर में अपनी रणनीतिक पकड़ को मजबूत करने और अफ्रीका में तुर्की के प्रभाव को संतुलित करने का प्रयास है। तुर्की पहले से ही इस क्षेत्र में अपनी सैन्य और कूटनीतिक ताकत बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। इजराइल की एंट्री से स्थिति में बदलाव आ रहा है।