अमेरिका की नई रणनीति: ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए चीन पर नजर
अमेरिका की नई रणनीति
नई दिल्ली: अमेरिका की ईरान पर आर्थिक दबाव डालने की योजना अब एक नए चरण में प्रवेश कर चुकी है। यह केवल ईरान के तेल उद्योग तक सीमित नहीं है, बल्कि उन चीनी कंपनियों और वित्तीय संस्थानों पर भी ध्यान केंद्रित कर रही है, जो प्रतिबंधों के बावजूद तेहरान के साथ व्यापार कर रहे हैं। ईरान के तेल निर्यात में चीन की महत्वपूर्ण भूमिका है। Kpler के आंकड़ों के अनुसार, 2025 में ईरान से निर्यातित तेल का 80 प्रतिशत से अधिक चीन में पहुंचा। अमेरिकी ट्रेजरी के अनुसार, यह आंकड़ा लगभग 90 प्रतिशत तक पहुंचता है, और चीनी स्वतंत्र रिफाइनरियां इस तेल की प्रमुख खरीदार हैं। इन रिफाइनरियों को आमतौर पर 'टीपॉट' कहा जाता है।
टीपॉट रिफाइनरियां चीन की कुल रिफाइनिंग क्षमता का लगभग एक चौथाई हिस्सा संभालती हैं। इनका व्यापार अक्सर कम लाभ पर होता है और कई संयंत्र प्रतिबंधित देशों से सस्ते कच्चे तेल पर निर्भर रहते हैं। यदि अमेरिका ईरानी तेल पर कार्रवाई बढ़ाता है, तो इन कंपनियों के लिए कच्चे माल की उपलब्धता और व्यापार दोनों में कठिनाई हो सकती है। अप्रैल 2026 में अमेरिका ने चीन की एक प्रमुख स्वतंत्र रिफाइनरी, हेंगली पेट्रोकेमिकल, पर भी प्रतिबंध लगाया था।
सेकेंडरी प्रतिबंधों का खतरा
अमेरिका की अगली रणनीति उन संस्थाओं को निशाना बनाने की हो सकती है, जो सीधे ईरान के साथ नहीं, बल्कि उसके साथ व्यापार करने वाली कंपनियों की सहायता करती हैं। इसे सेकेंडरी प्रतिबंध कहा जाता है। इसका प्रभाव उन बैंकों, शिपिंग कंपनियों और व्यापारियों पर पड़ सकता है, जो ईरानी तेल से संबंधित लेनदेन में शामिल हैं।
अमेरिकी ट्रेजरी पहले ही वित्तीय संस्थानों को चीनी टीपॉट रिफाइनरियों के साथ व्यापार से जुड़े जोखिमों के बारे में चेतावनी दे चुका है। विभाग का कहना है कि ईरानी तेल के व्यापार में फ्रंट कंपनियों, बिचौलियों और 'शैडो फ्लीट' का उपयोग किया जाता है। जहाजों की पहचान छिपाना, दस्तावेजों में बदलाव करना और समुद्र में जहाज से जहाज तक तेल पहुंचाना इसके कुछ तरीके हैं।
चीनी बैंकों पर नजर
अमेरिकी दबाव का अगला केंद्र चीन के बड़े वित्तीय संस्थान हो सकते हैं। अमेरिकी अधिकारियों ने चीन और हांगकांग की कुछ संस्थाओं पर ईरानी तेल से जुड़े अरबों डॉलर के लेनदेन में मदद करने का आरोप लगाया है। यदि बड़े चीनी बैंक भी अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में आते हैं, तो इसका प्रभाव केवल ईरान पर नहीं, बल्कि अमेरिका-चीन आर्थिक संबंधों पर भी पड़ेगा। हालांकि, बीजिंग की ओर से जवाबी कार्रवाई की संभावना भी बनी हुई है। चीन पहले ही अमेरिकी प्रतिबंधों का विरोध कर चुका है और कुछ चीनी रिफाइनरियों पर लगाए गए प्रतिबंधों को मानने से इनकार कर चुका है।
अमेरिकी रणनीति की चुनौतियाँ
अमेरिका लंबे समय से ईरान की तेल आय को रोकने के लिए कंपनियों, जहाजों और व्यापारियों पर प्रतिबंध लगा रहा है। लेकिन इस रणनीति की एक बड़ी चुनौती यह है कि एक संस्था पर कार्रवाई के बाद उसकी जगह दूसरी कंपनी या नया नेटवर्क सामने आ जाता है। प्रतिबंधों के विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान ने समय के साथ ऐसे नेटवर्क विकसित कर लिए हैं, जिनकी मदद से वह तेल बेचने और भुगतान प्राप्त करने के रास्ते खोज लेता है। इसलिए अमेरिकी कार्रवाई को 'व्हैक-अ-मोल' रणनीति से जोड़ा जा रहा है, जिसमें एक रास्ता बंद होने के बाद दूसरा रास्ता खुल जाता है।
अमेरिका ईरान की व्यापारिक क्षमता को कमजोर करने के लिए तेल के अलावा विमानन और अन्य क्षेत्रों पर भी प्रतिबंध बढ़ा सकता है। इसका उद्देश्य ईरान के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामान, पैसा और सेवाएं प्राप्त करना कठिन बनाना होगा। यह दबाव ऐसे समय बढ़ रहा है जब अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य में शिपिंग पर भी कड़ा रुख अपनाया है। इस मार्ग से तेल का बड़ा हिस्सा वैश्विक व्यापार से जुड़ा है। हाल के दिनों में यहां जहाजों की आवाजाही धीमी हो गई है, जिससे ऊर्जा बाजार पर भी प्रभाव पड़ा है।
जमीनी नाकेबंदी की संभावना
ईरान पर दबाव बढ़ाने के विकल्पों में जमीनी स्तर पर उसकी सीमाओं को अधिक सख्ती से नियंत्रित करने की संभावना भी चर्चा में है। इसके लिए इराक, तुर्की, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, अजरबैजान और आर्मेनिया जैसे पड़ोसी देशों का सहयोग आवश्यक होगा। हालांकि, इस योजना को लागू करना आसान नहीं है। ईरान की कई सीमाएं पहाड़ी और कठिन इलाकों से होकर गुजरती हैं।
इसके अलावा, पड़ोसी देशों की अपनी राजनीतिक और आर्थिक प्राथमिकताएं हैं। ऐसी स्थिति में व्यापक जमीनी नाकेबंदी के लिए लंबे समय तक सहयोग बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होगी। इस तरह की कार्रवाई का सबसे सीधा असर ईरान के आम लोगों पर पड़ सकता है। यदि भोजन, ऊर्जा, कपड़े और अन्य आवश्यक सामानों के आयात में बड़ी रुकावट आती है, तो देश के भीतर आर्थिक दबाव और बढ़ सकता है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इससे राजनीतिक बदलाव की कोई गारंटी नहीं है और इसके उलटे मानवीय संकट की स्थिति गंभीर हो सकती है।
सेकेंडरी टैरिफ का विकल्प
ट्रंप प्रशासन उन देशों के खिलाफ टैरिफ लगाने की संभावना पर भी विचार कर सकता है, जो ईरान के साथ व्यापार जारी रखते हैं। इससे ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों और कंपनियों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव बनाया जा सकता है। हालांकि, इस दिशा में भी कानूनी और राजनीतिक अड़चनें हैं। प्रस्तावित उपायों को लागू करने के लिए अमेरिकी कांग्रेस की मंजूरी आवश्यक हो सकती है और इस मुद्दे पर डेमोक्रेट्स के साथ-साथ कुछ रिपब्लिकन नेताओं के बीच भी चिंता है।
कुल मिलाकर, अमेरिका ईरान की कमाई के प्रमुख रास्तों को बंद करने के लिए एक साथ कई मोर्चों पर दबाव बढ़ाने की तैयारी में है। लेकिन चीन की भूमिका इस पूरी रणनीति को जटिल बनाती है। ईरानी तेल के सबसे बड़े खरीदार के रूप में चीन पर कार्रवाई से तेहरान को नुकसान हो सकता है, लेकिन वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच आर्थिक और रणनीतिक तनाव भी बढ़ सकता है।